
सर्वगुण संपन्न नहीं है कोई,
गुण अवगुण तो सब में होई।
माने सब स्वयं को सबसे श्रेष्ठ,
कोई अनुज है तो कोई ज्येष्ठ।
एक उंगली उठाओ दूसरे की ओर,
बाकी तीनों इशारा करती अपनी ओर।
मोह माया के चक्कर में फंस गया इंसान,
तृष्णा में पड़ इंसानियत भूल गया इंसान।
आना जाना यही दुनिया की रीत है ,
त्याग, विनम्र, धैर्य, साहस जीवन गीत है ।
मीठी बाणी बोल के दिल में जगा लो प्रीत,
नैकी कर दरिया में डाल बन जाए जीवन संगीत।
पहचान कर खुद को थोड़ा तो संवार ले,
ज्यादा के फेर में पड़ छोटी खुशियां गंवार दें।
तेरा मेरा कुछ नहीं खाली हाथ थे आएं,
प्राण निकले जब देह साथ ना जाएं।
प्रिया काम्बोज प्रिया
सहारनपुर उत्तर प्रदेश











