
घड़ी की सुइयां भाग रही हैं, थमता नहीं है शोर,
कल की चिंता खींच रही है, अपनी-अपनी ओर।
दौड़ रही है दुनिया सारी, कैसा ये अंधकार,
धुंधली होती जा रही है, जीवन की रफ्तार।
अपनों से मिलने की फुर्सत, अब तो बची नहीं,
सपनों के पीछे भागते हैं, पर नींद कहीं नहीं।
मशीन बन गए हम सब यहाँ, लोहे के किरदार,
थमकर ज़रा सा देख तो ले, जीवन की रफ्तार।
मिट्टी की वो सोंधी खुशबू, भूली बिसरी बात,
स्क्रीन में सिमट गई अब, दिन और काली रात।
ठहर ज़रा सा सांस तो ले, तू क्यों है बेज़ार?
सच्ची खुशी में ढूँढ ले तू, अपनी ही रफ्तार।
मंज़िल भी मिल जाएगी, तू सफ़र का ले आनंद,
भागदौड़ में मत गँवा, जीने की ये छंद।
रीना पटले, शिक्षिका
जिला- सिवनी मध्यप्रदेश











