
यह कहानी पूर्णतया सच्ची कहानी है।किसी अन्य कहानी इसका कोई लेना-देना नहीं है।काल्पनिकता से दूर एक सच्ची और जीती-जागती मिसाल है राजन चौधरी।
ये केवल एक नाम नहीं है बल्कि बहुत से लोगों और बच्चों के सपनो,उम्मीदों को पूरा करने वाला एक ऐसा इंसान हैं,जो केवल औरों के लिए जीता है ।
गर मैं इसे फरिश्ताकहूं तो गलत नहीं होगा ।
यह कहानी है मुजफ्फरनगर के एक छोटे से गांव गदनपुरा की,जो खतौली के पास और मेरठ की सीमा से लगा हुआ है। एक परिवार पिता करणवीर सिंह माता शारदा देवी के यहां एक लड़का पहले ही था ।6साल बाद फिर से घर में किलकारियां गूंजने वाली थी ।24अगस्त 1994को मां शारदा देवी ने दो जुड़वां बच्चों को जन्म दिन था । एक लड़का और एक लड़की । दोनों बच्चे स्वस्थ थे । दादा चौ.ब्रहमपाल सिंह ने तो मन्नत तक मांग रखी थी यदि बच्चे पूर्ण रूप से स्वस्थ होगें तब वे 11मन लड्डू का प्रसाद बांटेंगे ।बड़ा पोता अक्सर कर थोड़ा बीमार सा रहता था । किन्तु 6महिने बाद जुड़वां बच्चों में से लड़की की मौत हो गयी।अब बस केवल दो भाई थे। बड़े लड़के का नाम अजय कुमार और छोटे का नाम राजन चौधरी था । दादी हमेशा बच्चों के पास रहती पूरा ख्याल रखती थी । एक दिन जब शारदा देवी छोटे बेटे को नहला रही थी तो अचानक छोटे बेटे राजन के शरीर पर नीले रंग के धब्बे दिखाई दिए।ऐसा लग रहा था जैसे शरीर के अंदर खून जम गया हो ।शारदा देवी बहुत परेशान हो गयी ,क्यो कि बड़े बेटे और भाई को हिमोफिलिया नामक एक बीमारी थी जिसकी वजह से वे सोचने पर मजबूर हो गयी कहीं छोटे बेटे को भी यह बीमारी तो नहीं । किसान परिवार से होने के कारण आर्थिक स्थिति ज्यादा ठीक नहीं
थी,इसलिए वो राजन को दिल्ली के एम्स हास्पिटल में ले गये । वहां जाकर उन्हें पता चला कि छोटे बेटे राजन को भी यही बीमारी है ।वो बहुत परेशान हो गयी कुछ समझ नहीं आ रहा था पहले भाई को, जो की 4 बहनो में इकलौता भाई था ।फिर बड़े बेटे को और अब राजन को भी । परिवार पर मानो पहाड़ सा टूट गया । घरवालों ने डाक्टर से परामर्श किया और साथ ही पूरी जानकारी हासिल की ।
डाक्टर ने कहा””हिमोफिलिया एक अनुवांशिक बीमारी है जो एक मां द्वारा उसके बच्चों को होती है ।जिसका कोई इलाज नहीं है। पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है ।समय रहते यदि रोकथाम ना की जाए तो एक से दूसरे और तीसरे सभी बच्चे इसके शिकार हो जाते हैं।
लक्षण _* खून का लगातार बहना।
*थक्के ना जमना
- जोड़ो में बेहिसाब दर्द
- सूजन ।
इसका कोई स्थाई रूप से इलाज नहीं है ।यह एक लाइलाज बीमारी है।केवल दो तरीके से ही पीड़ित व्यक्ति एक आसान जिंदगी जी सकता है ।
*( Blood transfusion)इसमें पीड़ित व्यक्ति कोबार बार खून चढ़ाया जाता है।
दूसरा है - फैक्टर एक प्रकार का इंजेक्शन भी कह सकते हैं परन्तु यह इतना महंगा होता था कि आम आदमी इसे खरीद नहीं सकता था ।
इसीलिए शारदा देवी और करणवीर सिंह दोनों ही अपने बेटों को समय समय पर खून देते रहते थे । उस समय मात्र एक उपाय यही था ।समय बीतता गया दोनों बच्चे गांव के ही स्कूल जाते थे ।मगर मां बाप हमेशा इसी कोशिश में रहते की कहीं कोई चोट न लग जाए , इसलिए वे उन्हें बाहर खेलने नहीं देते थे बस आंखों के सामने रखते ।बीमारी के चलते ही बड़े भाई आगे पढ़ाई नहीं कर सके ।जब राजन कक्षा 5मे था तब एक दिन स्कूल के एक अध्यापक (टीचर) ने उसके हाथों पर छड़ी मार दी जिसके कारण उसके हाथ नीले पड़ गये ।घर पर जब दादी जी ने राजन के हाथ देखें तो गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया और वे भी स्कूल पहुंच गयी ।स्कूल जाकर टीचर की अच्छी खासी क्लास लगा दी , और धमकी दे दी कि हमारे बच्चों को हाथ न लगाएं ।
राजन को बचपन से ही डांस, किक्रेट, और घूमने का बहुत शौक था ।मगर बीमारी की वजह से कहीं बाहर नहीं जा सकते थे ।मगर राजन इस सब के बावजूद स्कूल के हर प्रोगाम मे भाग लेता ,चाहे कल्चर प्रोगाम हो या किक्रेट मैच ।कभी कभी तो खेलते समय घुटनों में दर्द हो जाता जिसके कारण उसे बीच में मैच छोड़ना पड़ता था ।दर्द भी ऐसा जो एक घंटा या दो घंटे नहीं बल्कि एक से दो दिन बीत जाते थे ।मगर दर्द जाने का नाम नहीं लेता ।शारदा देवी बहुत परेशान रहती एक तरफ इकलौता भाई और दूसरी तरफ दोनों बच्चे एक ही बीमारी से लड़ रहे थे । सितंबर 2006मे शारदा देवी के भाई की तबीयत बिगड़ी गयी दिल्ली एम्स हास्पिटल में भर्ती कराया गया । वहां से ठीक होने पर छुट्टी मिल गई ।दो तीन बार बल्ड भी चढ़ा ।बाद में फिर बल्ड की जरूरत पडी मगर ब्लड न मिलने की वजह से तबियत बहुत बिगड़ गयी और 7 सितम्बर 2006 को उनके भाई की मृत्यु हो गई ।भाई की मृत्यु ने शारदा देवी को अंदर से तोड़ दिया था जिसका इकलौता भाई और उससे अधिक प्यार करता हो उस बहन पर क्या बीतेगी इसका अंदाजा हम नहीं लगा सकते ।राजन का मामा राजन का मामा नहीं बल्कि दोस्त थे । राजन और उसके मामा की आपस में बहुत पटती थी । राजन अब दसवीं कक्षा में आ गया । जिंदगी की गाड़ी अभी पटरी पर चढ़ी ही थी कि एक दिन स्कूल में क्रिकेट मैच खेलते हुए टीचर के साथ बहुत जबरदस्त टक्कर हो गयी ।उस समय बच्चो के साथ टीचर भी गेम्स खेलते थे । राजन और टीचर दोनों ही कैच पकड़ने दौड़े तो आपस में टकरा गये ।टक्कर इतनी जोरदार थी कि राजन के पैर में knee से ब्लीडिंग शुरू हो गई । पैर में सूजन अधिक थी , बर्फ़ से शिकायी की जाती थी ।शारदा देवी तो बस राजन को हर वक्त गोद में ही लिए बैठी रहती ।दर्द इतना था कि राजन सही से खड़ा भी नहीं हो पाता था एक सप्ताह तक इसी तरह दिन रात परेशानी में बीते जिसकी वजह से राजन का स्कूल छूटा गया । कुछ लोगों ने उसकी इस परेशानी को नाटक का नाम दे दिया । लोगों की बातें सुनकर राजन उदास रहने लगा ।किसी भी चीज में उसका मन नहीं लगता था ।मां हमेशा यही कहती कि सब ठीक हो जाएगा ।इसी बीच राजन के चाचा-चाची गांव आए, वे गुड़गांव में रहते थे ।राजन को यूं उदास देख चाचा-चाची उसे अपने साथ ले गए । शुरू शुरू में राजन का मन नहीं लगा लेकिन धीरे-धीरे उसका मन अब लगने लगा , चाचा-चाची के साथ कभी बाहर घूमने जाता तो कभी बाजार ,कभी सिनेमा हॉल।राजन ने वहां कुछ नये दोस्त भी बनाये।कभी कभी राजन सोचने लगता कि जिंदगी कितनी लम्बी है केवल दर्द में रह कर जिंदगी नहीं जी जाती ।गांव वापस आया । फिर दोबारा दसवी में एडमिशन लिया । गणित और विज्ञान विषय के पेपर में राजन को बहुत परेशानी हुई रोते-रोते पेपर कम्पलीट किया बहुत दर्द में था ।2010मे राजन ने 45%के साथ दसवीं यू.पी.बोडऀसे पास की । महिने में दो चार बार दर्द से कराहते हुए बारहवीं कक्षा भी पास की,भी वो पूरे 57% कलावर्ग से ।
सन् 2008 से लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल दिल्ली में हिमोफिलिया के इंजेक्शन सरकार की तरफ से फ्री मिलने शुरू हो गये थे । गांव के एक स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। बैंकिंग और टीचिंग के लिए गंगानगर (मेरठ)में आकर कोचिंग शुरू की ,कमरा किराए पर ले रहने लगा ।साथ में दो नये दोस्त भी बनाये, सचिन काम्बोज और प्रभांश ।
एक बार की बात है जनवरी का महिना रात के 11,12बजे राजन को सोल्डर में दर्द शुरू हो गया । धीरे धीरे दर्द बढ़ने लगा । राजन जब तक बर्दाश्त कर सकता था उसने किया । इसी तरह 2 घंटे बीत गये । राजन रोने , चिल्लाने लगा, अब उसे बदर्दाश्त नहीं हो रहा था । रात के करीब 3:30बजे सचिन और प्रभांश उसे डाक्टर के पास ले जाने की कोशिश करने लगे । मगर राजन की हिम्मत नहीं थी कि वह जा सके ।मकान मालिक से स्कूटी ली सचिन काम्बोज और प्रभांश ने उसे जैसे तैसे स्कूटी पर बैठाया ,मगर हाय री किस्मत,स्कूटी चली नहीं । धक्के मार मार कर डा. के क्लिनिक ले गये। जैसे तैसे राजन के गुड़गांव वालें चाचा को फोन किया । डाक्टर ने एक इंजेक्शन लगा दिया , सुबह तक चाचा जी आ गये वे उसे दिल्ली लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल ले गये।दो दिन तक राजन बेहोश रहा तीसरे दिन जब आंख खुली तो खुद को गुड़गांव चाचा के यहां पाया । कुछ दिनों तक दिल्ली से गुड़गांव चाचा उसे इलाज के लिए ले जाते थे । कुछ महीनों तक ऐसे ही चलता रहा । ठीक होने पर दिल्ली से ही कोचिंग शुरू कर दी। कोचिंग के दौरान ही नोएडा में जाऑब के लिए इंटरव्यू दिया । पहला इंटरव्यू और जांब लग गयी ।मगर महिने में दो तीन बार अपनी बीमारी के चलते छुट्टी करनी पड़ती थी । जिसकी वजह से नौकरी छोड़नी पड़ी । और जगह इंटरव्यू दिये । दोबारा फिर नौकरी मिल गयी । कुछ ग़लत लोगों के चक्कर में पड़कर घर में बिना बताए कुछ पैसों को फंसा दिया ,कर्ज चढ़ चुका था ,नौकरी छुट गई। परेशान हो गांव लौट आया । सन् 2016मे रिलायंस कम्पनी द्वारा हिमोफिलिया के लिए बनाये गये फेक्टर के बारे में पता चला ।ये भी पता चला कि यह फेक्टर लोगों को सुट नहीं आ रहा था ,इस फेक्टर से बहुत सी परेशानी का सामना करना पड़ रहा था । बहुत सी कम्पलेन आ रही थी ।राजन ने इसकी शिकायत लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल के इनचार्ज से भी की ।मगर इस बात का कोई असर नहीं हुआ । लोगों ने यहां तक कहा की कुछ भी फायदा नहीं होगा इतनी बड़ी कम्पनी से उलझना ठीक नहीं ।मगर राजन ने तो ठान लिया था कि वो अब चुप नहीं बैठेगा ।
राजन ने रिलायंस कम्पनी के इस फेक्टर की पूरी जानकारी हासिल की । दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और भी अन्य जगह से जहां जहां रिलायंस कम्पनी के फेक्टर भेजे गये थे वहां से भी सारे सबूत इकट्ठा किए ।सबूतों को दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन के एसीसटेंट से बात की । बहुत हाथ पैर मारने के बाद तब जाकर कहीं वो फेक्टर बदल लिए गये ।
इस मुहिम के बाद जयपुर से हिमोफिलिया सोसायटी के एक कार्यक्रम में चीफ गेस्ट के रूप में बुलाया गया ।2017मे ग्रेजुएशन पूरी की ।
उन्हीं दिनों 2018 में राजन की दूर की एक मौसी जो आस्ट्रेलिया में रहती थी वो भारत आयी हुई थी तो उनसे मुलाकात हुई । उन्होंने राजन को प्रोत्साहन दिया कि क्यो न तुम एक एनजीओ बनाओ जो हिमोफिलिया से ग्रसित लोगों के लिए काम करे । बहुत सारी जानकारी दी।मौसी ने यहां तक कहा”” कभी कोई मदद चाहिए तो मुझे बताना ।”‘
तब राजन के मन मे विचार आया कि क्यो न मैं दूसरों के सपनो को पूरा करने में मदद करूं जो इस बीमारी से पीड़ित हैं ।
मेरठ कचहरी के वकील संजय जैक्सन से बात कर
26 नवम्बर 2018 को एक संस्था की नींव रखी ,नाम है आई डी्म टू ट्रस्ट,जो पंजीकृत हैं ।
*आई डी्म टू ट्रस्ट का मतलब है सपनों को पूरा करने का विश्वास ।
26 नवम्बर 2021मे आईं डी्म टू ट्रस्ट तीन साल पूरे होने जा रहे हैं । 17 अप्रैल को Worldहिमोफिलिया दिवस मनाया जाता है। गांव गांव में जागरूकता पैदा करने के लिए रैली निकाली गई।
आई डीम टू ट्रस्ट द्वारा पहला रक्त दान कैम्प फरीदाबाद में कोरोना समय में 23अगस्त2020 को किया था ।
इसके बाद 2020मे दिपावली पर गरीब , भिखारियों को दीप दिए जिन्हें बेचकर वे सब कुछ कमाई कर सके ।
दूसरा रक्त दान शिविर हस्तिनापुर के मालीगांव में 20जून लगाया ।
तीस और चौथा कैम्प का आयोजन 10जौलाई को मेरठ के मदवाडी और 17सितम्बर को मेडिकल कॉलेज में किया गया था।
फ़रवरी 2019मे जीवन संदेश ट्रस्ट (मेरठ) के द्वारा
नेशनल अवार्ड से सम्मानित किया गया।
24अगस्त2020 को मेरठ के चैयरमेन अमितराणा ने स्वयं फोन कर जन्मदिन की बधाई दी जो राजन चौधरी के जीवन की सबसे बड़ी खुशी मिली।इनके द्वारा किये गये कार्यों के कुछ फोटो
2021मे समाधान संस्था से भी सम्मान मिला ।
दिसंबर 2020मे गरीबों और सड़क किनारे लोगों को कमरबंद वितरण किए।यह संस्था गरीब और बेसहारा लोगों के लिए काम करती है ।
कोरोना समय में गरीबों को मुफ्त भोजन दिया गया।
यह संस्था हिमोफिलिया और थैलेसीमिया के बच्चों और बड़ों के लिए मदद करता है । ऐसे लोगों के जीवन में राजन चौधरी एक उम्मीद,आशा की किरण बन कर आते हैं जो अपनी बीमारी के चलते अपनी जिंदगी से निराश और हताश हो चुके थे
यदि आप भी किसी प्रकार से इनका साथ देना चाहते हैं तो उनके नम्बर पर सम्पर्क कर सकते हैं । उनकी संस्था के विषय में किसी भी प्रकार की जानकारी आप फेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर वीडियो देख सकते हैं यह एक पंजीकृत संस्था है जो केवल गरीब लोगों और हिमोफिलिया और थैलेसीमिया के मरीजों, बच्चों के लिए कार्य करती है ।
राजन चौधरी द्वारा लिखी कुछ पंक्तियां——-
कोशिशों के सफर में हम भी राही बन गये
खराब मुकम्मल हो इसी कोशिश में लग गये
सफर अभी लंबा है मंजिल भी दूर है
मगर कुछ कर दिखाने का नशा आंखों में चूर है
यहां उठाने वालों से ज्यादा गिराने वाले मिलते हैं
मगर घबराना नहीं इनसे भी तो तजुर्बे ही मिलते हैं
यह जो आग लगी है दिल में किसी को दिखा नहीं सकते
बुलंदियों को छूने की चाहत को दिखा नहीं सकते
कुछ सपनों के साथ तय किया था सफर भटक मत जाना
एक दो कांटों के आने से मंजिल छोड़ मत जाना
जब सफर पूरा होगा सुनहरे अक्षरों में लिखा जाए गा
हमारे संघर्ष की कहानी को इतिहास में पढ़ा जाएगा ।
रक्त दान जीवन दान
प्रिया काम्बोज प्रिया
सहारनपुर उत्तर प्रदेश











