
आज वक्त तेरे हाथ
कल का क्या भरोसा
पल-पल बदलती इस दुनिया में
वक्त दे या न दें कल तेरा साथ
कल-कल करता चला
कल न जाने आए न आए कल
यूं ही वक्त टलता -टलता टल चला ।
कदम तेरे आगे बढ़ें
निःसंदेह आएंगी मुश्किलें
इस पर क्या सोचना
सोच-सोच में टलता-टलता वक्त चला
मंजिल तेरी मिलेगी कैसे कल
किसी से आशा न कर
आगे बढ़ कर राह बना
उस राह को देख-देख कर
तेरे अपनों की भी राहें जाएं गी खुल।
जब मंजिल मिलेगी
नजरें मिलाने को तुझे दुनिया निहारेगी कल
अब अपने कर्म पथ पर चलाचल ।
ये ही गीता का उपदेश
न जाने कर्मफल आज मिलें या मिलें कल।
जो बढ़े वो ही मंजिल पर देखें सुनहरा कल
यहां पड़े-पडे़ कुछ न मिलेगा
सब कुछ मिलेगा… वक्त से लड़ मिलेगा कल
आगे बढ़ खोल बंद किस्मत के पट
कल किसने देखा आएगा जो कल।
महेश शर्मा, करनाल











