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साये की टकराहट


गाँव का मैदान सन्नाटे में डूबा था। धूल अभी थोड़ी-सी बैठी थी, लेकिन हवा में अब भी डर की गंध तैर रही थी।
बलदेव सिंह जीप से उतरा। उसका चेहरा कठोर था, आँखों में आग थी और हाथ में बंदूक। मगर उसके कदमों में कोई हड़बड़ी नहीं थी—जैसे वह जानता हो कि आज का दिन उसका नहीं, बल्कि गाँव का फैसला लाएगा।
अंजना उसके सामने खड़ी थी। उसकी आँखों में डर नहीं, केवल दृढ़ता और स्पष्टता थी।
राजन और विवेक उसके पीछे खड़े थे।
गंगाराम चौपाल के किनारे खड़ा था, जैसे अपनी निगाहों से पूरे मैदान को थामे हुए हो।

  1. पहले शब्दों की भिड़ंत
    बलदेव ने ठंडी आवाज़ में कहा—
    “तुम लोग यहाँ क्या कर रहे हो? ये गाँव मेरा है। यहाँ कोई पंचायत नहीं होगी। और तुम, लड़की… तुम्हें अपनी हिम्मत कहाँ से मिली?”
    अंजना ने शांत स्वर में उत्तर दिया—
    “गाँव तुम्हारा नहीं, बलदेव। गाँव उसकी आत्मा का है, जो डर, पाप और अन्याय से दबा दी गई है। आज उसका सच सामने आएगा—और तुम उसे रोक नहीं सकते।”
    बलदेव हँसा। उसकी हँसी में घमंड और नासमझी दोनों झलक रहे थे—
    “सच? तुम जैसे नौजवानों और लड़कियों का सच क्या होता है? सच वही होता है जो मेरे हिसाब से चलता है। अब हट जाओ और वापस जाओ, वरना परिणाम भुगतने पड़ेंगे।”
    अंजना ने एक कदम आगे बढ़ाया—
    “गाँव के लोग अब डरने वाले नहीं। हमारा डर तुमसे नहीं, तुम्हारे पाप से है। और जो सच दबा है, वह अब बाहर आएगा।”
    भीड़ में हलचल हुई। लोग धीरे-धीरे आगे बढ़े। कुछ हाथों में लकड़ी और लाठी थीं।
  2. पहला संघर्ष
    बलदेव ने बंदूक उठाई।
    तभी गंगाराम की तेज आवाज गूँजी—
    “रुको! तुम गोली चलाकर गाँव की आत्मा को और गहरा घाव नहीं दे सकते!”
    बलदेव का हाथ काँपने लगा। उसने देखा—लोग अब डर नहीं रहे थे, बल्कि ठान चुके थे कि जो सही है, उसे दबने नहीं देंगे।
    अंजना बोली—
    “अगर तुममें सच का सामना करने की हिम्मत नहीं है, तो खुद ही पीछे हट जाओ। आज तुम्हारे पाप और इस गाँव की परछाईं सीधी टकराएँगी।”
    बलदेव झुंझलाया—
    “तुम लोग समझ नहीं सकते। मैंने इस गाँव को बचाया है!”
    गंगाराम ने कदम बढ़ाया—
    “बचाया? तुमने डर और हत्या फैलाकर खुद को बचाया है। लेकिन सच हमेशा बाहर आता है—और आज तुम्हारा सामना होगा।”
  3. परछाईं की चेतावनी
    अचानक हवा तेज हुई। लालटेन काँपने लगीं। दूर कहीं मोटरसाइकिल की गूँज उठी।
    मैदान में, जैसे अँधेरे से, एक लंबी काली परछाईं उभरी।
    भीड़ सिहर उठी। गाँव की पुरानी कहानियाँ, जिन्हें डर के कारण भुला दिया गया था, आज जीवित हो उठीं।
    गंगाराम ने धीमे स्वर में कहा—
    “देखो, बलदेव… ये वही परछाइयाँ हैं जो तुम्हारे पाप के साथ चलती रहीं। आज वो तुम्हें अकेला नहीं छोड़ेंगी।”
    बलदेव पीछे हट गया। उसकी आँखें फैल गईं।
    उसे महसूस हुआ—भीड़, अंजना और गंगाराम के अलावा भी कुछ है…
    कुछ ऐसा, जो न गोली है, न लाठी—
    लेकिन जिसकी उपस्थिति ही उसे भीतर तक कंपा रही है।
  4. निर्णायक पल
    अंजना आगे बढ़ी। भीड़ उसके पीछे।
    बलदेव ने देखा—आज तक जो डर उसने फैलाया था, वही अब उसकी अपनी पीड़ा बनकर सामने खड़ा है।
    अंजना ने कहा—
    “तुम्हारे पापों की परछाईं अब गाँव की आँखों के सामने है। कितनी मौतें… कितनी रातें… कितना डर… अब जवाब का समय है।”
    बलदेव ने फिर बंदूक उठाई—
    लेकिन गंगाराम की एक ही नजर ने उसे रोक दिया।
    अंजना ने उसका हाथ पकड़ लिया—
    “अब कोई बच नहीं सकता। सच सामने आएगा—और अन्याय का अंत होगा।”
    भीड़ एक स्वर में गूँजी—
    “सच! सच! सच!”
    उसी क्षण, बलदेव की ताकत ढहने लगी।
    अँधेरे में उसकी परछाईं सिमटने लगी।
    उसका घमंड, उसका डर, उसके पाप—सब उजाले में आने लगे।
    आज पहली बार गाँव ने महसूस किया—
    भय और अत्याचार की दीवार टूट सकती है।
    आर एस लॉस्टम

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