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गजल

मदहोश जिंदगी में
कैसे तुम्हें भूलाऊं।2
कहूं क्या मैं ,किसको जाके
हर तरफ ही तुझको पाऊं।।2
मदहोश जिंदगी में,,,2
कैसे तुम्हें भूलाऊं,,,
हर तरफ ही तुझको पाऊं,,,

ऐसा कहीं नहीं है,
जहां तेरा वजूद ना है।2
मै जिधर भी देखता हूं
हर तरफ तेरी ,ही तोअदा है,,।।2
कहूं क्या मैं किसको जाके,,,
हर तरफ ही तुझको पाऊं,,
मदहोश जिंदगी में,,,,

हर कोई मुझे बता दे
जहां तेरा जर्रा नहीं है।2
वो है हर एक कतरे में,,
यहां तू ही तो, तू ही तू है,,
कहूं क्या मैं किसको जाके,,,2
हर तरफ ही तुझको पाऊं,

तेरी ही तो मेहरबानी है
तेरी रहमत बरस रही है।2
तेरी ही नजरे करम है,,
तेरा ही ये ,वजूद सारा,,।।2
कहूं क्या मैं किसको जाके,,3
हर तरफ ही तुझको पाऊं,,

कहूं क्या मैं तुझसे ऐ मालिक,,2

मुझे कहना नहीं है आता2
मुझे अपना बना के, रखना
कभी नजरों से ना दूर जाऊं,,,।।2
कहूं क्या मैं तुझसे ऐ मालिक,,
हर तरफ ही तुझको पाऊं,,।।
मदहोश जिंदगी में
कैसे तुम्हें भूलाऊं,,,।।2
कहूं क्या मैं किसको जाके
हर तरफ ही तुझको पाऊं,,,2

राजेंद्र कुमार तिवारी मंदसौर, मध्य प्रदेश

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