
आत्मा है वो दर्पण
सत्य का कराए दर्शन
मैं क्या हूं– स्वंय से है कहां छिपा
आत्मा रह कर मौन
इस धरा पे हर इंसान को
बता दे तूं है कौन ।
जग के आगे ढोंग रचाए
आत्मा बार-बार उसे समझाए
इंसान को समझ न आए
इंसान अपनी चालाकियों पर
मन ही मन मुस्काए
इंसान जब स्वयं से करने लगे छल
उस की आत्मा रहे विकल ।
यह भी तो असत्य है
सत्य से कोसों दूर
किसी नियम या कानून की परिधि से बाहर
वह गर्व से कहे —
मैंने कुछ गलत नहीं किया
जिस से गलत हुआ
उसकी आत्मा के समक्ष वह हेय हुआ ।
ये भी तो स्वयं से हुआ है– छल
ये छल —
उस परम सत्ता की बही में हो जाए दर्ज
जब ऐसा घटित हो पाप
वो होता स्वयं के लिए संताप
कितनी भी कर लो पूजा
वो न मिले
सत्य की राह पर चलना
है असि ( तलवार) की धार
चढ़े जो उस पे
एक-आध उतरे पार
ये जग मिथ्या और झूठ से लबालब
कुंठित नर का व्यवहार।
महेश शर्मा, करनाल












