
वो स्त्री….
जो करती समर्पण अपना
सदैव ही छली जाती।
करती अपने सपनों को अर्पित
बस त्याग मूर्ति बनी रहती।
कभी मर्यादा के नाम पर
कभी पारिवारिक जिम्मेदारी ।
कर देती सर्वस्व न्योछावर
फिर भी नहीं मिलती हिस्सेदारी।
सुने कौन उसके मन की पीड़ा
उसकी इच्छाओं का कहना क्या?
भोर रश्मियां सी उसकी उम्मीदें
निस दिन शाम सी ढलती रहती।
ये नहीं कि,जानती नहीं उड़ना,
पर उसके बंदिशों से बंधे हुए हैं ।
दिखते नहीं अंकुश वह जो
उसके ऊपर लगे हुए हैं।
हुई विदा घर से……..
अंजुरी में कुछ सपने थे।
संजोत रही उन्हें निस दिन
तिजोरी के गहने से।
कब कर्तव्य की भेंट चढ़े,
सब सपने उसके अनमने से।
होता द्रवित हृदय उसका भी
जब-जब इच्छाएं मारी जाती।
करती जिस पर वह पूर्ण भरोसा
क्यों ? उससे ही हारी जाती।
उर्मिला ढौंडियाल ‘उर्मि’
देहरादून (उत्तराखंड)










