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लघु कथा”मुखौटे के पीछे का दर्द”

गुड़िया ने आज फिर पुरानी अलमारी खोली। ऊपर के खांचे में एक छोटी सी पेटी रखी थी, जिसे पिछले पांच सालों से किसी ने नहीं छुआ था। उसमें उसके पति का पसंदीदा गमचा, घड़ी और एक अधूरी चिट्ठी थी।
​शहर की भीड़भाड़ में गुड़िया सबसे मुस्कुराकर मिलती। दफ्तर में उसे ‘सबसे खुशमिजाज इंसान’ का खिताब मिला था। वह लंच ब्रेक में सहकर्मियों को हंसाती और शाम को बच्चों के साथ ठहाके लगाती। किसी को भनक तक नहीं थी कि वह हंसी सिर्फ एक मुखौटा थी। असली रीना तो हर शाम घर की दहलीज पर कदम रखते ही कहीं खो जाती थी।
​वह खाली मेज पर दो कप चाय रखती। एक खुद के लिए और एक उस कुर्सी के सामने, जो बरसों से खाली थी। वह हवाओं से बातें करती, अपनी तरक्की की खबर सुनाती और फिर जवाब के इंतजार में घंटों खामोश बैठी रहती। जब चाय ठंडी होकर जम जाती, तब उसे अहसास होता कि कमरा कितना डरावना शांत है।
​उसकी हंसी दरअसल एक गहरा सन्नाटा थी। वह लोगों के बीच इसलिए ज्यादा बोलती थी ताकि उसे अपने अंदर की चीखें न सुनाई दें। दर्द जब हद से गुजर जाता है, तो वह आंखों से बहना बंद कर देता है और पत्थर बनकर सीने में जम जाता है। वह दुनिया के लिए जी रही थी, पर भीतर से उस दिन ही मर चुकी थी, जब आखिरी बार उन्होंने विदा कहा था।
​सफेद दीवारों पर टंगी उनकी धुंधली तस्वीर को देख उसने धीरे से फुसफुसाया, “आज फिर चाय ठंडी हो गई।”
कथाकार
रीना पटले, शिक्षिका
शास.हाई स्कूल ऐरमा, कुरई
जिला- सिवनी,मध्यप्रदेश

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