
बावरा बन,सुन मेरे मन, इस ज़माने में,
है भटकता, दौड़ता ,किसकी तलाश में?
संत जन कहते “वो” बसता जग के कण-कण में,
क्यों रे मन तू ढूंढता है उसको वन वन में?
लालसा की बाँह थामे चाहतों के शोर में,
है पुकारे फिर रहा किसकी तलाश में?
ये भी संचय,वो भी संचय,आगे की सोचे है तू,
सांस कितनी गिन के लाया ये भी ना जाने है तू,
गुरुजनों का,वृद्ध जन का,कहाँ श्रद्धा तेरे मन में?
अनमना सा तू है फिरता किसकी तलाश में?
अपने अंदर क्या कभी झांका है तूने बावरे?
मन के मंदिर में विराजे देख तेरे सांवरे!
प्रभुमिलन की आस ले भागादौड़ी की व्यर्थ में,
कस्तूरी मृग सा भटकता किसकी तलाश में?
सुलेखा चटर्जी











