
विश्वास नहीं जहां
सत्य कर्म की आस कहां
विश्वास ही रिश्तों की नींव
विश्वास पर ही टिका है ये जगत
और टिकी सृष्टि और लोक परलोक में वास।
विश्वास के बल पर
दो आत्माएं गूढ आत्मबल आकर्षण से अभिभूत हो कर
…..हो जाएं एकाकार
चाहे जन्म हो धरा पर उनका बारंबार ।
अच्छे बुरे कर्म करें और फल पाएं
ये ही — गीता का सार ।
विश्वास ही आत्मबल
इस से मन मस्तिष्क में उत्सर्जित हो ज्ञानप्रकाश
विश्वास जगत की रीढ है
इस बिन न संबंध …. न पाए विश्वास विकास
आत्मविश्वास के बल पर
पा ले जीवात्मा छुपे रहस्य
और सत्य ज्ञान प्रकाश।
न आत्म मिलन हो
न परमात्मा की अनुभूति हिय में उपजे
जिस की उसे तलाश।
अविश्वास बस ! भटकन करे उत्पन्न …. उत्पन्न करे संत्रास।
जब विश्वास टूटे….. टूट जाए जीवन के श्वासोच्छवास ।
विश्वास ही मानव-मानव में अमूल्य धरोहर
नहीं तो चहुं दिस विनाश।
जहां दिलों उत्पन्न हो अविश्वास
संघर्ष ले जन्म
कोई कर्म संपन्न न हो
टूट जाए जग में आस
मन को ले अंधकार घेर…. ढूंढ़े न मिले प्रकाश।
महेश शर्मा, करनाल











