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गृहिणी


गृहस्थी की वृहद इमारत में
अदृश्य रहती है वह।
रिश्तो का ताना-बाना बुनती है,
उसे सहेजती है, धागा टूटे ना कहीं,
छूटे न कहीं, देखती भी है।
उसका सुघढ़ व्यक्तित्व भले
अदृश्य रहता हो, सबका सब कुछ
उसे ही संभालना होता है।
अपने लिए सोचने का भी
वक्त नहीं होता है।
इमारत की नींव में जो अदृश्य रहते हैं
उन्हें थमने का, थकने का,
टूटने का या कुछ भी बोलने का
हक नहीं होता है।
वह गृहिणी होती है, जिसका
पूरा गृह ऋणी रहता है।

सुलेखा चटर्जी

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