
शहर की भीड़भाड़ से दूर,राकेश एक छोटे से गाँव का युवक था जिसकी आँखों में ऊँचे सपने और दिल में अपनी मंजिल की तलाश थी। गाँव की पगडंडियों पर चलते हुए वह अक्सर क्षितिज की ओर देखता और सोचता कि क्या वह कभी उस पार की दुनिया देख पाएगा। उसके पास न तो बहुत साधन थे और न ही कोई बड़ा मार्गदर्शक, बस एक अटूट जिद्द थी।
राकेश ने शहर का रुख किया। शुरुआती दिन संघर्षों से भरे थे; कभी भूखे पेट सोना पड़ा तो कभी तिरस्कार झेलना पड़ा। उसे लगा कि मंजिल का रास्ता फूलों की सेज नहीं, बल्कि काँटों भरी राह है। वह कई बार असफल हुआ, लेकिन हर हार ने उसे एक नया सबक सिखाया। उसने समझा कि मंजिल केवल एक स्थान नहीं, बल्कि खुद को तराशने का एक सफर है।
सालों की कड़ी मेहनत और रातों की नींद त्यागने के बाद, अंततः उसने उस मुकाम को हासिल किया जिसका उसने सपना देखा था। सफलता के शिखर पर खड़े होकर जब उसने पीछे मुड़कर देखा, तो उसे अहसास हुआ कि असली खुशी उस मंजिल को पाने में नहीं, बल्कि उस ‘तलाश’ के दौरान आए बदलावों में थी। राकेश केवल एक सफल व्यक्ति ही नहीं, बल्कि एक अनुभवी और परिपक्व इंसान बन चुका था। पर भगवान को कुछ और ही मंजूर था!?! क्या यही थी उसकी मंजिल!!??!!
कहानीकार
रीना पटले,शिक्षिका
शास.हाई स्कूल ऐरमा,कुरई।
जिला- सिवनी मध्यप्रदेश











