
जिधर भी देखो उधर तनाव
आज छोटे बड़े सभी की जिंदगी में तनाव के घाव
बढती इच्छाओं ने घेर लिया
भौतिक सुविधाओं का नहीं रहा अभाव।
मानवीय धर्म हुआ लुप्त
आध्यात्म पक्ष न जाने कहां खो गया
कर्तव्य भावना न जाने कहां हो गई सुप्त
किशोर क्यूं है विडियो गेम में खोया
विद्यार्थी भविष्य की चिंता में …. भय ने उसे डुबोया।
शिक्षित रोजगार को ले–
राहों में भटके
काम-धंधे फलीभूत न हो
वो भी नित्य खाएं झटके।
पतिदेव काम के बोझ का मारा
कहां जाए बेचारा ….घर आए वक्त का मारा
घर के छोटे बड़े फिरें बौराए
सामान्य गृहणी देख-देख हड़काए ।
किसी को
कुछ समझ न आए
कहीं से मिल जाए आज उपाय
कर्मचारी कहे मेरे सिर पे बोझ है भारी
अधिकारी की डांट से आई मुझे तनाव की बिमारी
डाक्टर कहे दवा लगे कैसे
तनाव घटाओ … ये है महामारी ।
आपा-धापी मची है जग
ताक़तवर देश की लाठी में है दम
वो कहें– जैस हांके वैसे चलो सनम
छोटी सत्ता कहे–
मर मिट जाएंगे….न पालो भ्रम….पीछे हटें न हम।
सामान्य वर्ग कहे–
ले आए क्यूं ये स्वार्थ भरे कानून
मेरी सन्तति पर खतरे के बादल छाए
नस्लें के मिट जाने का भय सताए।
जहां भी देखो–
दिलों मे लगी है आग ।
तनाव ने घेर लिया मानव को आज
बढती इच्छाओं के वशीभूत समस्त धरा
जीते जी —
जन-जन आज तनाव से मरा।
महेश शर्मा, करनाल











