
विधा – कहानी
शीर्षक – पत्थर का महत्व
एक पहाड़ी गांव में एक चट्टान से गिरा एक पत्थर रास्ते के किनारे पड़ा था वह हर रोज देखता था कि कैसे लोग उसे ठोकर मारकर आगे चलते हैं कोई उसे उठाता नहीं कोई उसे जरूरी नहीं समझता वह पत्थर हर रोज चांद को देखकर सोचता कि मैं वाकई बेकार हूं क्या मेरी कोई कीमत नहीं है एक दिन बारिश के बाद की सुबह एक मूर्तिकार वहां से गुजरा रहा था उसकी नजर उसे पत्थर पर पड़ी उसने उसे उठाया उलट पलट कर देखा और मुस्कुरा दिया पत्थर हैरान था इतने सालों में मुझे किसी ने देखा नहीं और यह मुझे उठकर मुस्कुरा क्यों रहा है मूर्तिकार उसे अपने साथ अपने गांव ले गया एक शांत कोने में बैठकर उसे एक पत्थर को छिनी और हथौड़ी से तलाशना शुरू किया हर चोट के साथ पत्थर चिल्लाया आह। क्या कर रहे हो क्यों मुझे तोड़ रहे हो मूर्तिकार शांत था वह कुछ नहीं बोला बस उसे लगातार तरसता रहा दिन बीते रात बीती पत्थर दर्द से करता रहा और धीरे-धीरे उसने कुछ नया जन्म लेने लगा कुछ हफ्तों बाद जब तरस पूरी हुई तो पत्थर अब पत्थर नहीं रहा वह एक सुंदर मूर्ति बन चुका था भगवान की दिव्या प्रतिमा गांव के लोग जब उसे देखने आए तो तो हर कोई हाथ जोड़कर सर झुकने लगा लोग उसके सामने दीपक जलाते फूल चढ़ाते और मां की बातें कहते वही पत्थर जिसे लोग ठोकर मारते थे आज पूज्य बन गया था उसका स्थान मंदिर के गर्भगरी में बना और लोग उसे भगवान कहने लगे और तब पत्थर ने खुद से सवाल किया क्या मैं वही पत्थर हूं जिसे लोग कभी ठोकर मारते थे और जवाब मिला हां मैं वही हूं पर फर्क बस इस बात का था की एक कलाकार ने मुझे पहचाना और मेरी कीमत पहचान कर मुझे तलाश 100 दोस्तों इस पत्थर की तरह हम सभी लोग हैं जिंदगी में हमें कई लोग हमारी काबिलियत को नहीं समझते हम खुद भी अपने आपको बेकार समझते हैं लेकिन अब जीवन की चीनी अपने जीवन पर पड़ा तो दर्द होता है बहुत होता है और इस दर्द के पीछे से जन्म लेती है हमारी असली पहचान जिसे दुनिया पत्थर समझती है ।
। धन्यवाद ।
रचनाकार - नंदकिशोर गौतम (माध्य.शिक्षक)
शास. उच्च. माध्य. विद्यालय बकोड़ी, ब्लॉक- कुरई, जिला सिवनी (म.प्र.)











