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पितृभूमि की रक्षा: धर्म, वंश और भविष्य की सुरक्षा का संकल्प

हम सभी क़ो यह समझना आवश्यक है कि हमारी जमीन केवल खेत, खलिहान या प्लॉट नहीं है; वह हमारे अस्तित्व की जड़ है। अथर्ववेद में स्पष्ट कहा गया है — “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” (अथर्ववेद 12.1.12) अर्थात् यह भूमि मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ। यह वचन कोई श्लोक मात्र नहीं, बल्कि जीवन का सिद्धांत है। जब वेद हमें पृथ्वी का पुत्र बताते हैं, तब जमीन का संबंध खरीद–फरोख्त का नहीं, बल्कि ममता और संरक्षण का हो जाता है। गांव का प्रत्येक व्यक्ति यह बात जानता है कि जैसे माँ का आंचल जीवन भर सुरक्षा देता है, वैसे ही जमीन परिवार को पीढ़ियों तक संभालती है। जिस मिट्टी में हमारे पूर्वजों का पसीना मिला हो, जहाँ उनकी स्मृतियाँ बसी हों, उसे केवल पैसों के लिए बेच देना अपने ही इतिहास को मिटा देना है। जमीन रहेगी तो परिवार की जड़ बनी रहेंगी; जमीन चली जाएगी तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल किरायेदार बनकर रह जायेंगें। इसलिए हमारा पहला धर्म यही है कि भूमि को संपत्ति नहीं, माता मानकर उसका सम्मान करें।

शास्त्रों में कहा गया है कि मनुष्य तीन ऋण लेकर जन्म लेता है — देवऋण, ऋषिऋण और पितृऋण। पितरों ने हमें केवल जन्म नहीं दिया; उन्होंने जमीन, घर, परंपरा और सम्मान की धरोहर भी दी है। मनुस्मृति कहती है — “यो मातरं पितरं वा हिंस्यात् स पातकी स्मृतः” (मनुस्मृति 4.162) — जो माता-पिता का अहित करता है, वह पापी है। जब भूमि को माता कहा गया है और पितरों का श्रम उसकी आत्मा है, तब पूर्वजों की जमीन को स्वार्थ में बेच देना क्या पितरों के परिश्रम का अपमान नहीं है? शास्त्र यह भी बताते हैं कि पितृ–ऋण का निर्वाह संरक्षण और संवर्धन से होता है। यदि हमारे दादा ने पाँच नाली खेत छोड़ा, तो हमारा कर्तव्य है कि उसे बचाकर रखें, सुधारें, न कि उसे टुकड़ों में बाँटकर बेच दें। पैसा आज मिलेगा, पर जमीन चली गई तो भविष्य में न खेत रहेगा, न रोज़गार मिलेगा और पहचान भी चले जाएगी। यह समझना जरूरी है कि जमीन बेचना केवल एक दस्तखत नहीं, बल्कि वंश की जड़ पर कुल्हाड़ी चलाने के समान है।

भागवत पुराण में वर्णन आता है कि जब अधर्म बढ़ता है तो पृथ्वी गौ के रूप में रोती हुई ब्रह्मा के पास जाती है। इसका अर्थ यही है कि जब मनुष्य लालच में धर्म भूल जाता है, तो धरती दु:खी होती है। महाभारत में कहा गया है — “भूमिर्देवी धृतिः क्षान्तिः सा हि सर्वस्य धारिणी” — भूमि देवी है, धैर्य और क्षमा की मूर्ति है, सबको धारण करने वाली है। सोचिए, जो सबको धारण करती है, उसका हम क्या करते हैं? यदि हम ही उसे बेचकर पराया बना दें, तो वह हमें कैसे संभालेगी? वंश को एक पेड़ मानिए और जमीन को उसकी जड़ समझो। जब जड़ मजबूत होगी तो शाखाएँ फलेंगी; यदि जड़ कट जाएगी तो पेड़ सूख जाएगा। यदि हम अपने पूर्वजों की जमीन बेच देंगे तो धीरे-धीरे परिवार की एकता टूटेगी, फिर भाई-भाई में दूरी आएगी, फिर अगली पीढ़ी शहरों में भटकेगी। यह क्रम धीरे-धीरे चलता रहेगा, अंततः गांव खाली हो जायेगा। इसलिए पुराणों की सीख है कि अधर्म का बीज मत बोइए; वरना उसका फल संतानों को भुगतना पड़ेगा।

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं — “क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते” (गीता 2.3) — हे अर्जुन, कायरता को मत अपनाओ; यह तुम्हारे योग्य नहीं है। इसका सीधा अर्थ है कि अन्याय देखकर चुप रहना भी उचित नहीं है। यदि गांव में कोई व्यक्ति केवल लालच में पितरों की जमीन बेच रहा है, तो बाकी लोग यह कहकर चुप न रहें कि “यह उसका निजी मामला है।” गांव एक परिवार की तरह होता है। जैसे घर में कोई सदस्य गलती करे तो बड़े लोग समझाते हैं, वैसे ही समाज का भी कर्तव्य है कि समझाए, रोकें और सही मार्ग दिखाए। महाभारत में द्रौपदी के अपमान के समय सभा का मौन इतिहास में प्रश्न बन गया। इसलिए मौन रहना भी कभी-कभी अधर्म में भागीदारी बन जाता है। गांव के लोग यदि मिलकर ठान लें कि कोई भी अपनी पैतृक भूमि नहीं बेचेगा, तो कई परिवार बिखरने से बच सकते हैं।

जमीन केवल अन्न नहीं देती, सम्मान भी देती है। ऋग्वेद में अन्न और भूमि की महिमा गाई गई है, क्योंकि अन्न से जीवन चलता है। किसान की असली ताकत उसकी जमीन है। जमीन रहेगी तो खेती होगी, पशु होंगे, घर में अन्न रहेगा। जमीन बिक गई तो कुछ दिन हाथ में पैसा रहेगा, फिर वही पैसा खर्च हो जाएगा। उसके बाद न खेत रहेगा, न आय का स्थायी साधन रहेगा। कई गांवों में देखा गया है कि जमीन बेचने के बाद परिवार शहरों में मजदूरी करने को मजबूर हो जाते हैं। क्या यह हमारे पूर्वजों का सपना था? उन्होंने तो खेत इसलिए जोड़े थे कि आने वाली पीढ़ियाँ सुरक्षित रहें। इसलिए सोचिए, क्या थोड़े से पैसों के लिए हम अपने बच्चों का स्थायी आधार छीन लें? वेद हमें संयम सिखाते हैं, लालच नहीं। जो आज की सुविधा के लिए कल की सुरक्षा खो देता है, वह दूरदर्शी नहीं, बल्कि “वह अनजाने में अपनी ही जड़ों का व्यापार कर बैठता है।”

अंततः पितरों की भूमि केवल कानूनी कागज़ का टुकड़ा नहीं है, बल्कि धर्म, स्मृति और भविष्य की सुरक्षा का आधार है। ऋग्वेद में अन्न की महिमा गाई गई है, क्योंकि अन्न से ही जीवन चलता है और अन्न भूमि से ही उत्पन्न होता है। जिस धरती से अन्न निकलता है, वही हमारे जीवन, परिवार और समाज को स्थिरता देती है। इसलिए भूमि को केवल बाजार की वस्तु मान लेना दूरदर्शिता नहीं, बल्कि अपने ही आधार को कमजोर करना है।

आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि यदि संकट आए तो परिवार और समाज मिलकर उसका समाधान खोजेंगे, पर अपनी जड़ों को नहीं काटेंगे, क्योंकि जड़ सुरक्षित रहेगी तो ही वंश सुरक्षित रहेगा; भूमि बचेगी तो ही गांव बचेगा; और गांव बचेगा तो ही हमारी पहचान और परंपरा जीवित रहेगी। यही समझदारी है, यही कर्तव्य है और यही हमारे बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की सच्ची नींव है।

पितरों की यह जमीन है, इसे न यूँ बेचो यार,
यहीं बसा है घर हमारा, यहीं हमारा संसार।
थोड़ा पैसा क्या देगा, सब कुछ खो जाएगा,
जमीन रहेगी तो ही, घर-परिवार बच पाएगा।

निवेदक:
योगेश गहतोड़ी

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