
यहाँ रिश्तों का मोल समझता कौन है,
जो रिश्तों में उलझे रहते हैं, उन्हें जानता कौन है।
भीड़ भरी इस दुनिया में हर चेहरा है अनजान,
दिल के टूटे आईनों को यहाँ पहचानता कौन है।
वे पहचान ही मर जाती हैं समय की धूल तले,
सच की धीमी आहट को यहाँ मानता कौन है।
हर कोई अपनी ही दौड़ में मशगूल रहा,
किसी के थमे हुए कदमों को यहाँ थामता कौन है।
जो चुपचाप निभाते रहे रिश्तों की रस्में उम्र भर,
उनके भीतर के घावों को यहाँ गिनता कौन है।
यहाँ रिश्तों का मोल समझता कौन है…
और सच्चे दिल की कीमत आँकता कौन है।
आर एस लॉस्टम










