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मरती इंसानियत

आज  जमाना बदल गया
ख्याल में बदलाव आया
नित कार्य में लीन हो गया
जल्दी वह स्थान पहुंच गया
इससे मरती इंसानियत हो।

एक के बाद एक दुख आता
कभी कभी बीमार पड़ता
धन दौलत से दुख होता
मदद करनेवाले नहीं होता
इससे मरती इंसानियत हो।

इसे नर को क्रोध बढ़ाता
आत्मबल क्षीण हो जाता
रिश्तेदार को भी भूल जाता
निरुत्साह से जीवित होता
इससे मरती इंसानियत हो।

वर्गों के बीच भेदभाव बढ़ता
लोगों में  द्वेष भाव बढ़ता
सहानुभूति का गुण घटता
आत्म बल भी क्षीण होता
इससे मरती इंसानियत हो।

श्रीनिवास यन,साहित्यकार
आंध्रप्रदेश

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