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क्रुद्ध होती गर्जना

हर जगह आधी है छाई
रात सी अब तो हो गई।
छा गया अब तो अंधेरा
धूल कुछ ऐसी उड़ गई ।।

गगन में छाया धुआं अब
हाय ! क्यों ऐसा हो रहा ।
गर्व में मानव मनुजता
के सभी पद क्यों खो रहा ।।

टूटते हैं आज वह घर
जो कभी बने ही नहीं ।
मुस्कुराता है विटप वह
जो कभी जमे ही नही ।।

मोहनी मुस्कान ने अब
जग विनिर्मित कर दिया ।
डगमगाए आज भूधर
युध्द ने तो सब ले लिया ।।

है मनुज चिन्ता ग्रसित
जब ईट पत्थर ढह गए।
क्रुद्ध होती गर्जना अब
प्रलय युध्द की कह गए।।

लग रहा है अब न होगा
मनुजता का मधुर संगम ।
भ्रमित जग है चकित चातक
अर्णव तरंगिणी चुप कह गए।।

डाँ . कृष्ण कान्त भट्ट
सेन्ट विन्सेंट पल्लोटि कॉलेज बेंगलूरु कर्नाटक

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