
जो स्वार्थ और दृष्टता से परे होता है
वो इंसानी सोच से ऊपर होता है
जो इंसानी सोच से ऊपर होता है
फिर तो हे प्रभु उसका भगवान ही मालिक होता है
इंसानी सोच से परे इन्सान हमेशा तन्हा होता है
घर से दूर हो जाता है बाहर भी कभी उसका नहीं होता है
ज्ञानियों के ज्ञान छोटे पड़ जाते है
दूनियाँ के रंग जब दिख जाते है
कलयुग है कोख का जना भी अपना नही होता है
दूनियाँ मे आते ही दूध का कर्ज़दार होता है
इन्सान रिश्तों मे जीने बाबत रिश्तों ही मे मर जाता है
नफ़रतों मे प्रेम या प्रेम मे नफरत तलाशने मे एक जीवन गुजर जाता है
अहं की दुनियां मे अपनत्व भटक रहा है
इंसानियत का अब हर घड़ी बलात्कार हो रहा है
जीने की दूनियाँ अब जलाने की दूनियाँ हो गई
जिल्लत गम आँसूओं मे डूब जाने की हो गई
नीचा एक दूजे को दिखाने होड़ सी लग गयी
खुद को राम सामनेवाले को रावण की उपाधि मिल गयी
अच्छाई अब कठघरे तक ही सिमट गयी
बुराई को नैकियत की पनाह मिल गयी
कलयुग है माँ को भी जन्म देने का जवाब देना होगा
दूनियाँ मे लाने का औलाद को हिसाब देना होगा
फर्ज ईमान शब्द जिन्दगी की डिक्सनरी से गायब हो गये
दिल दिमाग मे दिमाग ही खुदा हो गये
इस दुनियाँ से भगवान ने भी अपना पल्ला झाड़ लिया
बूते के बाहर की बात थी इसीलिये अपना तम्बू उखाड़ लिया
अफसोस है प्रेम की दुनियाँ अब शमशान हो गयी
इंसानी फितरत वीरान हो गयी
स्वरचित एवं मौलिक
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र












