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कविता।

बोइए सीता राम उगेंगे फसल के पावन धाम खिलेंगे।।
पितृत्व का.जब वात्सल्य उमड़ेगा तब दशरथ निज प्राण तजेगे।।

कोख हो गर कौशल्या वाली गुणो के इत उत खान मिलेंगे।।
मात हुई गर सौमित्रा सी लखन भी घर घर आम मिलेगे।।

कैकयी जैसी माँ की जरूरत तब ही तो राघव राम बनेगे।।
दिखी मंथरा भरे कान सब को! उद्योग न उनके आम मिलेगे।।

तंज दे दिया नाम ले लिया अब कहाँ ही फिर राम मिलेगे।?।
क्या ले न सकती थी माँ वैभव ? कैकयी की जो वो शान बनेगे।।

पर लिया तो उसने केवल कर्तव्य पथ जिन से होकर राम सजेगे।।
असहजता को सहज स्वीकारा ऐसे ही मे तो राम बनेगे।।

भरत से भी तो तिरस्कार ही पाया वनवासी जब प्राण बनेंगे।।
चुनौती को क्या दांव लगाया शय मे जिसकी त्राण मिलेंगे।।

बोइए सीता राम उगेंगे फसल के पावन धाम उगेंगे।।
उद्योग हो गर पर हित विचार का तो पात्र ऐसे ही खास मिलेंगे।।
बोइए सीता राम उगेंगे फसल के पावन धाम खिलेंगे।।

हाँ इक प्रश्न बड़ा सताये स्वाहा का बीज वो कहाँ से लाए ❓
जिससे बोई तो जाए सीता ! पर फसल मे जिसकी राम उग आए  ।।

बीज सीता का कहाँ से आए प्रश्न महत्व का रहा सताए ।।
कोख तो कोई जन नही सकती , बीज समर्पण फिर स्वाहा हो जाए ।?।

न ,न ,ऐसा हो नही सकता इसी को जनक लियो बुलाए ।।
आचरण अध्यात्म का लेकर मन मे धरा से सीत दिये लगाए।।

और उद्योग देवत्व सा ; स्नेह भरत सा भक्ति हनुमंत की सी पाए।।
रखा सीत जब गर्भ धरा के तो बीज सीता के स्व उग आए।।

ऐसे मे उपजी जो सीता फल जिसका स्व राम हो जाए।।
और देह नेह की बात कोई न हर कोई स्नेह से रहा भौरायें।।

सीत प्रहार से उपजी जब वीथा नाम सिया तभी दिया रखाए।।
यहीं बीज जीव धर्म अब जिनसे मनुज इक राम बन जाए।।

बोओं सीता अब राम खिलेंगे धरा के जो सब पाप हरेंगे।।
पाप भले हो रावण जैसा धनुष अपने से वे आप कसेगे।।

टंकार धनुष की केवल काफी पापी न अब पाप रचेगे।।
बोइए सीता राम उगेगे फसल को पावन धाम खिलेंगे।।

क्या बीज से बीज की भी संगत होगी उर्मिल श्रुत कीर्ति की उपज भी होगी।।
प्रभाव सीता का रीत रीझा सा प्रीत की रीत वह आप उपजेंगे।।

कर्त्तव्य सुगंध को रहे प्रस्तुत जो पात्र रामायण हर राह दिखेंगे।।
चाहिए,चाहिए ; हाँ इक सीता पात्र बाक़ी सब आप मिलेंगे।।

बोइए सीता राम मिलेंगे ताड़का खर दूषण जिससे डरेंगे।।
ऋषियों के सुकून की खातिर वन वन जो राह पग धरेंगे।।

निषाद केवट और वानस्पतिक तक घड़ी इंतजार की खत्म करेंगे।।
तपस्या उनकी जन्मों जन्म की आज तो बस फल वृक्ष झड़ेगे।।

बोइए सीता राम उगेगे फसल को पावन धाम खिलेगे।।
धर्म सनातन पुष्ट करने को जीवन सौंदर्य वो आप रचेंगे।।

प्रश्नो की  झड़ी लगा दी परिणाम की नज़र  सभी गढ़ा दी ।।
संबंधों का परिवार प्रबोधन  रामायण  मे  आन मिलेंगे।।

भाई-भाई का पिता-पुत्र का गुरू शिष्य का जो मान बढाए।।
राज प्रजा का आम सभा का सब ही तो सब वह दिये समझाए।।

महत्व धोबी का भी रखा जाएगा राम यह बात आप समझाए।।
संबधो की पोथी सुनाती कहानी जो जीवंत राम करेंगे ।।

बोइए सीता राम उगेंगे पावन फसल के धाम खिलेंगे
महकेंगे फिर पुष्प पुष्ट सब जब लव कुश बाद राम खिलेंगे।।

कौन है राम क्या केवल मनुज इक  या देव जो परहित संग्राम करेंगे
और करने को स्थापित मर्यादा जीव का हर एक संताप हरेंगे।।

तपाए जाएगे जो बाल ही पन मे क्षणिक न जो विश्राम करेगे
कर्त्तव्य सुगंध का रहा नज़र पथ राम ही वो जो उस साथ चलेंगे।।

गुरू की आज्ञा शिरोधार्य कर कंटक पथ को सार करेंगे।।
आसुर प्रवृति के महा खलनायक तभी ही तो  उनसे आप डरेगे।।

बोइए न सीता राम उगेंगे फसल के पावन धाम खिलेगे।।
उतर आएगा स्वर्ग धरा पर जब दीप की लौ वह आप जलेंगे।।

बोइए सीता राम उगेंगे फसल के पावन धाम मिलेगे।।
रामायण की सच सार्थकता प्रमाण को वो इतिहास रचेंगे।।

और कैसा राम अब प्रश्न है यह भी ; जो हो इक  राजा या घट घट रमेगे।।
विचार श्रृंखला अति विशेष सी कहते कहते न होठ थकेंगे।।

ऐसा राम जो हो न संकोची कर्त्तव्य पथ पर चुगे कसौटी ।।
तरकश मे तीर कृपा के अहिल्या को पाषाणता जो हरेंगे।।

करा कर जड़ता का अनुमोदन चेतन्यता का संचार करेंगे।।
अपराध बोध से ग्रसित मानसिकता को क्षण मे वह आजाद करेगे।।

और हो न जब  देने को उतराई सीता पर वह नज़र धरेंगे ।।
और सिया भी जब दे उतार  मुद्रिका अंगुली से दूर सिर्फ राम करेंगे।।

हर ले जाएगा तभी सिया रावण इसके भी संकेत मिलेंगे।।
राम का सानिध्य कितना जरूरी वर वधु क्या यह सच समझेंगे।।

तो राम सीता अब राम सीता नही सियाराम अब आप जपेगे।।
बोइए सीता राम उगेंगे फसल के पावन धाम उगेगे।।

ऐसे मे तब राम जो बनते  धन तन मन से रहे संवरते ।।
अनुमोदन आप प्रारब्ध समझते सब विधि से कभी भी न उलझते।।

पथ पर जब कर्त्तव्य बोध जो उसी रथ पर जा आप चहकते।।
लगाम कर्म की ऐसी सुंदर कोमल पांव जब धरा जिस धरते।।

राम राम की ध्वनि रह जाती और न नाम धरा पर  कोई और उपजते।।
पुरुषोत्तम तब एक ही केवल;बाक़ी तो अंजाम को तकते।।

बोइए सीता राम उगेंगे फसल के पावन धाम उगेगे।।
साधुता साध वैराग्य सी कैसे न ऐसे मे राम सधेंगे।।
बोइए सीता राम उगेंगे फसल के पावन धाम उगेगे।।

क्या दे सकते हो मुझे इक सीता; जो पात्र लक्ष्मण हनुमान गढ़ेगे!
देखकर भाव उनकी कर्मण्यताः का ;होड़  मे दौड़ पुण्य पड़ेगे।।

दे सकते हो तो दे दो  इक सीता ; बाक़ी सब काम तो राम करेंगे।।
सारी धर्म कर्म की बाते सीता से सब आप जुड़ेंगे।।

गुण अवगुण का कर सब मंथन नवनीत धर्म का रस चखेगे।।
दे दो न बस इक सिर्फ सीता राम राम चहुं ओर दिखेंगे।।

बोइए सीता राम उगेंगे फसल के पावन धाम खिलेगे।।
धर्म कर्म की सब ही व्याख्यान देव मनुज यक्ष गान लिखेगे।।

बाल्मिकी और दास तुलसी  तब घर घर घट घट आप दिखेगे।।
और लेगा कोई परीक्षा  अगर फिर जगह जगह हनुमंत दिखेगे।।

बोइए सीता राम उगेंगे फसल के पावन धाम उगेंगे।।
और भाव भक्ति का हनुमंत सरीखा तो हिय के सब ही राम दिखेगे।।

(अब भी….कुछ लोग प्रश्न चिन्ह लगाए है।।)

पूछ रहे क्यूं मांगता सीता सरल ये कौन कल्याण लिखेगे।।
राम गर राम बन भी जाए तो रावण भी तो आप सींचेगे।।

यहीं तो फर्क रहा  समझाना सीता से कैसे पाप रीतेंगे। ।
अग्न ताप की पावन ऐसी जिसकी भस्म मे रावण सींचेगे।।

प्रश्न इक यह भी कि क्यू हरे लंकेश सीता क्या इसके बिना न वह प्राण तजेंगे।।
तो सुन लो नियम अंत पाप का तब तक न वह काम करेंगे।।

जब तक पुण्य न पहुंचे पाप तक भक्षण कैसे उसे आप करेंगे।।
जब तक पाप की आसुरी धरा पर पुण्य के न हम पग तक धरेंगे।।

तब तक न उदय होते धर्म कर्म  कैसे ही फिर पाप मिटेगे।।
यह तो बात तम प्रकाश की एक को देख दूजे न टिकेगें।।

सब अनिवार्य कर्म के पथ पर पाप पुण्य के प्रश्न बढ़ेगे।
प्रारब्ध ही केवल मूल रामायण : काल की चाल न आप समझेंगे।।

चक्र तो नियति रही चलाए जिसमे हम सब आप चलेगे।।
उद्योग जगत का फर्क न कोई काज साज सब राम करेंगे।।

पर बोइए सीता राम उगेगे तभी तो सियवर ताज सजेगे।।
बोइए सीता राम उगेगे फसल के पावन धाम उगेगे।।

आवश्यकता रामायण को एक ही ;सीता सीता जो राम चींखेगे।।
वन का दृश्य भूल गए क्या जब हिरण वृक्ष से वे स्व पूछेगे।।

आह री सीता डाह वो चीखा; चीख़-पुकार को राम चींखेगे।।
अनिवार्य सी एक ही रीता सीता को नित जिस सींचेगे।।

धर्म कर्म की एक ही नायिका सीता वह जो राम चुनेंगे।।
बोइए सीता राम उगेंगे फसल के पावन धाम खिलेगे।।

बस इक सीता रामायण गीता कथा कथित रस आप चखेगे।।
बोइए सीता राम उगेंगे फसल के पावन धाम उगेंगे।।


संदीप शर्मा ‘सरल’
देहरादून उत्तराखंड

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