
युग युग से कस्तूरी मृग बन,
खोज रहा अपना अंतर्मन।
षट् रिपु मग में पग रोके हैं,
रह मन में प्रभु दूर खड़े हैं।
युग युग से चलती ये खोज,
उत्सुकता, मिलने की मौज।
किस विध प्रभु से मिल पाएं,
जप तप में प्रभु मिल जाएं?
दान धर्म भी खूब किए,
सुयश मिला खुश हो लिए।
मन में बसे प्रभु मुस्काए,
“इस नादां को क्या समझाएं?”
” सुन मानव, ” थे प्रभु बोले,
“मात-पिता की सेवा कर ले,
रख विश्वास, कर्म तू कर ले,
अंतर्मन में फिर झांक ले।
मैं तो तेरे संग हूं बालक,
कभी गुरु,कभी बन पालक।
इधर-उधर क्यों ढूंढे मुझको?
ऊपरी चमक क्यों मोहे तुझको?
सुलेखा चटर्जी भोपाल













