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एक मजबूर जिंदगी

हताशा और भये के साये तले चल रही ये जिंदगी है
कोई नही साथ अपने कि बस ये गाड़ी चल रही है

हौसला किसी का मिला नही आज तलक बस शीशे के माफिक टूट रहा है
जो था एक पास मेरे तेरी आस का आशियाना कसम अब वो भी छूट रहा है

भरोसा किसी पर क्या खुद पर भी कभी रहा नही ए जिंदगी
एक दिल था वो भी मशगूल हो गया किसी की थी बंदगी

ठोंकरों की जिंदगी ही मिली मुझे समझ ना आया
जैसा जिसको मिला मैं सबने ही हमे बेदर्द घुमाया

ताजिंदगी ही हम सुकून तलाशते रहे
तरस की एक आस तुमसे माँगते रहे

रोने को कोई पत्थर भी नसीब ना हुआ
दर्द अपना था अपना भी ना हुआ

तिनके सा खुद का विश्वास कतरा कतरा जोड़ जीता रहा
अपंगता मे भी दम पर अपनी जमाने के सामने खड़ा रहा

लड़ना ना जाना लड़ाई का खंजर सीने मे लेकर जीता रहा
जान ही जिंदा है जिस्म बाखुदा आज तक ढोता रहा

सज़ा है बतोर जिंदगी बस काट् रहा हूँ
ज़िंदा इस लाश को ही ढो रहा हूँ

बेखुदी को ए दोस्त अपनी कागज़ पर उतार रहा हूँ
रोने के वास्ते कसम धरा पर बस रेगिस्तान तलाश रहा हूँ

एक समुन्दर इन आँखों मे है निकलने को बेताब है
तन्हाई मेरी जो कल थी वो बदस्तूर कायम भी आज है

स्वरचित एवं मौलिक
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र

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