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सूर्यदेवता धरा को अनवरत प्रकाश दे रहे

सूर्यदेवता धरा को
अनवरत प्रकाश दे रहे,
रश्मि पुंज ज्योतियों से
जगत जगमगा रहे।
रवि रश्मियों से हमें
सुबुद्धि प्राप्त हो रही,
धृष्टता अंधकार की
कण कण बुझा रही।
तेज़पुंज दिव्य अश्वरथ
निरंतर चलता रहे,
सूर्यदेवता धरा को
अनवरत प्रकाश दे रहे।

प्राणिमात्र पुण्यकर्म
हेतु पाप मुक्त हों,
धर्म धीर बन सकें,
अधर्म के अजात शत्रु हों।
हर कण हर रोम में
शक्ति और अजीर्ण धैर्य हो,
धर्म वीर बन अधर्म का
तीव्रतम विरोध हो।
असंख्य सूर्य रश्मियाँ
अनवरत प्रबल रहें ।
सूर्यदेवता धरा को
अनवरत प्रकाश दे रहे ।

आपके प्रकाश का आत्मबल
कभी नहीं कहीं नहीं क्षीण हो,
विभावरी बीत जाये जगत से,
उषा नागरी जग में जगमगाये।
सिंधु की समग्र गहराई में और
शिखर अनंत ऊँचाई में रहें।
उत्तर दक्षिण पूर्व पश्चिम और
सर्वदिशा में आपकी महिमा रहे।
सूर्यदेवता धरा को
अनवरत प्रकाश दे रहे।

सूर्य तेज़ सा चरित्रवान और
कर्मशील हर व्यक्ति हो,
सन्त जन के लिये सदा धर्म
और सुन्याय का विधान हो।
सृजन हेतु हर सहाय हो,
विकास का हर प्रयास रहे,
आदित्य प्राणि मात्र में हर
ख़ुशी और आह्वलाद रहे।
सूर्यदेवता धरा को
अनवरत प्रकाश दे रहे।

डा० कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ

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