
आसमां,
अब कोई विस्तार नहीं-
एक परत है,
जो भीतर की दरारों पर चढ़ी है,
मैंने उसे ओढ़ा नहीं,
वो खुद उतर आया है,
मेरे और मेरे बीच,
यहाँ आवाज नहीं,
बस संकेत हैं-
टूटते हुए अर्थों के,
बिखरते हुए होने के,
तुम,
कोई व्यक्ति नहीं रहें,
एक धुंध हो,
जो आकार लेते ही
मिट जाती है,
समय-
रेखीय नहीं,
एक गोल चक्कर है,
जहाँ एक अंत,
खुद की शुरुआत को निगल जाता है,
मैं,
अब ‘मैं’ नहीं–
एक खाली जगह हूँ,
जिसमें कुछ टिकता भी नहीं,
आसम्नां की परत,
नीली नहीं,
पारदर्शी भी नहीं—
बस एक अभाव है,
जो हर उपस्थिति को खा जाता है,
और इस सब के बीच,
कुछ भी नहीं घट रहा,
फिर भी
सब कुछ,
धीरे-धीरे खत्म हो रहा है।।
डॉ पल्लवी सिंह 'अनुमेहा'
लेखिका एवं कवयित्री
बैतूल, मध्यप्रदेश












