
मेरी कलम से सजे मेरे ख़्वाब भी हैं,
कुछ अधूरे, और कुछ बेहिसाब भी हैं।
मेरी कलम लिखती उन सवालों को भी,
उन कागजों में जिनके जवाब भी है,,
कभी काली अँधेरों में खो जाती है,
कभी उम्मीदों का आफ़ताब भी है।
जो लब ना कह सके, तो तर्कीब भी ये,
कभी दर्द छिपाने का नक़ाब भी है।
कभी ख़्वाब टूटने पर ज़ख़्म भी है,
कभी इन ज़ख़्मों का मरहम भी है।
जो लिख पाती हर भरम को भी,
जैसे लिखना ही मेरी पहचान, मेरा करम भी है।
कभी लफ़्ज़ बिखरें तो सितम भी है,
कभी सुर मिलें तो सरगम भी है।
जो ख़्वाबों को मुकम्मल कर दे,
वो मेरे अल्फ़ाज़ भी हैं, मेरी क़लम भी है।
मेघा दास
सरायपाली महासमुन्द छ.ग












