बाल मनोविज्ञान की आज के समयनुसार अत्यन्त चिंताजनक मनोवैज्ञानिक सच्ची चुनोतियाँ

डाक्टर दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
समन्वयक। आदर्श संस्कार् शाला,भारत
आप देश के चर्चित लेखक,मोटिवेशनल स्पीकर ट्रेनर,प्रशिक्षित मार्गदर्शक, सामाजिक कार्यकर्ता है
आज का बच्चा मोबाइल की रोशनी में पैदा होता है और उसी की परछाई में बड़ा हो रहा है, ये सबसे बड़ी सच्चाई है। दो साल का बच्चा जब रोता है तो माँ लोरी नहीं सुनाती, यूट्यूब पर कार्टून लगा देती है, क्योंकि वो खुद थकी है, ऑफिस है, टेंशन है। नतीजा ये कि बच्चा बोलना देर से सीख रहा है, आँख मिलाना भूल रहा है, और माँ की आवाज से ज्यादा उसे स्क्रीन का नोटिफिकेशन टोन सुकून देता है। तीन साल का होते-होते उसकी उँगलियाँ स्वाइप करना जान जाती हैं पर मिट्टी छूने से डरती हैं। गली खत्म हो गई, फ्लैट के बंद दरवाजों में बचपन सिमट गया। शाम को पार्क में बच्चे कम और ट्यूशन की वैन ज्यादा दिखती हैं। खेलना अब पीरियड हो गया है, 45 मिनट का, और वो भी कराटे क्लास या स्केटिंग अकेडमी में। गिरना मना है, हारना तो बिल्कुल मना है, क्योंकि मम्मी-पापा ने फीस भरी है। ऐसे में बच्चा रिस्क लेना कब सीखेगा? जब हर गिरने से पहले ही उसे उठा लिया जाता है तो उसके अंदर की हिम्मत का मसल ही नहीं बनता। इसलिए आज 12 साल का बच्चा मैथ के सवाल में अटकते ही पेन फेंक देता है, दोस्त से लड़ाई होते ही ब्लॉक कर देता है, क्योंकि उसने झेलना सीखा ही नहीं।
नींद उसकी सबसे पहले छिनी है। रात 11 बजे तक रील्स, सुबह 6 बजे स्कूल बस। 6 से 13 साल के बच्चे को 9 से 11 घंटे नींद चाहिए पर मिल रही है 7 घंटे। कम सोया दिमाग चिड़चिड़ा होता है, याद नहीं रखता, पढ़ाई में मन नहीं लगता, फिर उसी के लिए डाँट पड़ती है। ये एक लूप है। शरीर भी जवाब दे रहा है। बैठे-बैठे पीठ झुक गई है, गर्दन फोन में धँसी रहती है, आँखें ड्राई हो रही हैं। 8 साल के बच्चे का चश्मा अब कोई ताज्जुब की बात नहीं। मोटापा डबल हो गया है पिछले 15 साल में, क्योंकि खेल मैदान की जगह मोबाइल गेम ने ले ली और भूख मिटाने के लिए मैगी-कुरकुरे हैं। पेट भर रहा है पर शरीर खाली है, विटामिन डी, आयरन, प्रोटीन सब कम। ऊपर से स्ट्रेस ईटिंग शुरू हो गई है। पेपर है तो चिप्स का पैकेट, दोस्त ने इग्नोर किया तो चॉकलेट। खाना अब इमोशन का इलाज बन गया है।
मन की हालत और पतली है। एंग्जायटी अब टीनएज का इंतजार नहीं करती, दूसरी-तीसरी क्लास में ही आ जाती है। प्रेजेंटेशन बोलना है तो पेट में दर्द, उल्टी, बुखार। कारण साफ है, परफॉर्मेंस का दबाव। 95 प्रतिशत भी कम लगते हैं क्योंकि सोशल मीडिया पर हर कोई टॉपर दिखता है। तुलना वायरस की तरह फैल गई है। 10 साल की बच्ची फिल्टर वाली फोटो देखकर अपने गाल, नाक, रंग से नफरत करने लगती है। लड़के सिक्स-पैक के पीछे पागल हैं। बॉडी इमेज की जंग इतनी छोटी उम्र में शुरू हो गई कि सेल्फ-वर्थ सिर्फ लुक्स और लाइक्स पर टिकी है। और ये लाइक्स का नशा डोपामाइन का खेल है। 15 सेकंड की रील तुरंत मजा देती है, पर 15 मिनट किताब पढ़ना सजा लगता है। दिमाग को धीमी खुशी बर्दाश्त ही नहीं। इसलिए फोकस खत्म, सब्र खत्म, बोरडम झेलने की ताकत खत्म। क्लास में टीचर 5 मिनट बोल दे तो बच्चा खिड़की से बाहर देखने लगता है, क्योंकि उसका दिमाग हर 8 सेकंड में नया स्टिमुलस माँगता है। इसे लोग ADHD बोल देते हैं, पर असल में ये डिजिटल ओवरडोज का साइड-इफेक्ट है।
सबसे खतरनाक बात ये है कि बच्चे अब अकेले हैं, भीड़ में भी। मम्मी-पापा दोनों काम पर, दादा-दादी दूसरे शहर में। बच्चा स्कूल से आता है, खाली घर, खालीपन भरने के लिए फोन। किसी से लड़ाई हुई, दिल टूटा, डर लगा, तो गूगल से पूछता है, “डिप्रेशन कैसे ठीक करूँ”। पेरेंट्स को पता तब चलता है जब हाथ पर ब्लेड के निशान दिखते हैं या सुसाइड नोट मिलता है। साइबर-बुलिंग ने तो कमर तोड़ दी है। पहले स्कूल में चिढ़ाते थे, घर आकर सेफ था। अब व्हाट्सएप ग्रुप पर 24 घंटे मजाक उड़ता है, फोटो मॉर्फ हो जाती है, मेमे बन जाते हैं। बच्चा स्कूल बदल ले, शहर बदल ले, पर स्क्रीनशॉट उसका पीछा नहीं छोड़ते। शर्म, डर, गिल्ट में वो घुटता है और बोलता किसी से नहीं, क्योंकि सोचेगा कि मम्मी-पापा तो पहले ही परेशान हैं, और दोस्त? वो तो खुद उसी ग्रुप में हँस रहे हैं।
परिवार का रोल भी दो एक्सट्रीम पर झूल रहा है। एक तरफ हाइपर-पेरेंटिंग है। बच्चे का दिन मिनट-टू-मिनट प्लान है। स्कूल, ट्यूशन, कोडिंग, जिमनास्टिक, फ्रेंच क्लास। साँस लेने की फुर्सत नहीं। माँ-बाप सोचते हैं बेस्ट दे रहे हैं, पर असल में बच्चे से उसका बचपन छीन रहे हैं। वो रोबोट बन रहा है जो ऑर्डर फॉलो करता है पर खुद डिसीजन नहीं ले पाता। दूसरी तरफ एब्सेंट-पेरेंटिंग है। “ले बेटा फोन, बस चुप रह”। खाना, कपड़ा, गैजेट सब हाजिर, पर बात करने वाला कोई नहीं। इमोशनल भूखा बच्चा अटेंशन के लिए कुछ भी करेगा, ऑनलाइन अजनबी से दोस्ती, खतरनाक चैलेंज, गलत रिलेशनशिप। दोनों ही सूरत में बच्चा इमोशन रेगुलेट करना नहीं सीखता। जरा सी परेशानी आई नहीं कि पैनिक अटैक, मेल्टडाउन, या कंप्लीट शटडाउन।
स्कूल और सिस्टम भी पीछे नहीं। NEP 2020 में सोशल-इमोशनल लर्निंग की बात है पर जमीन पर काउंसलर का मतलब है एडमिशन इंचार्ज। 500 बच्चों पर एक काउंसलर, वो भी पार्ट-टाइम। टीचर खुद स्ट्रेस में हैं, सिलेबस का प्रेशर, रिजल्ट का प्रेशर। उनके पास टाइम कहाँ कि वो देखें कौन सा बच्चा क्लास में खोया-खोया है, किसकी आँखें रोज सूजी आती हैं। ऊपर से भारत में 1 लाख बच्चों पर 2 चाइल्ड साइकियाट्रिस्ट भी नहीं। प्राइवेट थेरेपी 2000 रुपये सेशन। मिडिल क्लास माँ-बाप सोचेगा, इतने में तो महीने का राशन आ जाए। तो इलाज होता ही नहीं, प्रॉब्लम दब जाती है, और 15 साल की उम्र में डिप्रेशन बनकर फटती है।
कोविड ने तो रही-सही कसर पूरी कर दी। 2020 से 2022 के बीच जो बच्चे 2 से 5 साल के थे उन्होंने मास्क वाला चेहरा देखा, सोशल डिस्टेंसिंग देखी। बोलना सीखने की उम्र में उन्होंने आधे चेहरे देखे, इसलिए स्पीच डिले केस तिगुने हो गए। लोगों से मिलना, शेयर करना, वेट करना, ये बेसिक स्किल्स ही डेवलप नहीं हुईं। अब वो बच्चे पहली-दूसरी क्लास में हैं और टीचर परेशान हैं कि ये बच्चे ग्रुप में काम नहीं करते, झगड़ते हैं, तुरंत रो पड़ते हैं।
तो गलती किसकी? किसी एक की नहीं। ये पूरी इकोसिस्टम की क्रैश है। टेक्नोलॉजी खराब नहीं, हमारा उसे हैंडल करने का तरीका इम्मैच्योर है। काम्पिटिशन खराब नहीं, पर हमने उसे जिंदगी-मौत का सवाल बना दिया। पेरेंट्स विलेन नहीं, वो खुद इस रेस में पिस रहे हैं, EMI, जॉब इन्सिक्योरिटी, सोशल प्रेशर। पर भुगत कौन रहा है? वो बच्चा जिसके पास न तो भागने की उम्र है न समझ।
अब करना क्या है? वापस बेसिक पर आना पड़ेगा। बोरडम को इलीगल मत बनाओ। दिन में एक घंटा बच्चा खाली बैठे, दीवार देखे, छत निहारे। वहीं से क्रिएटिविटी फूटेगी। गिरने दो उसे। साइकिल से गिरे तो तुरंत मत उठाओ, देखने दो कि वो खुद उठ सकता है। यही रेजिलियंस है। फीलिंग्स को नाम दो। “रो मत” की जगह बोलो, “तुझे गुस्सा आ रहा है क्योंकि तेरा गेम डिलीट हो गया, राइट?”। जब बच्चा अपनी फीलिंग का नाम जान जाएगा तो उसे कंट्रोल भी कर लेगा। खाना टेबल पर साथ खाओ, फोन सबके बंद। 20 मिनट की बातचीत दिन भर की थेरेपी से भारी है। स्कूल से मार्क्स के अलावा ये पूछो कि मेरा बच्चा दूसरों की मदद करता है क्या, हारकर क्या करता है। और सबसे जरूरी, खुद फोन नीचे रखो। बच्चा लेक्चर नहीं, एक्जाम्पल देखता है।
कड़वा सच ये है कि हमने बच्चों को सफल बनाने के चक्कर में सम्पूर्ण बनाना छोड़ दिया। IQ शार्प है पर EQ खोखला। जानकारी का ओवरडोज है पर समझ का अकाल। अगर अब भी नहीं संभले तो अगली पीढ़ी एंग्जायटी पिल्स पर जिएगी, रिलेशनशिप में टिक नहीं पाएगी, और 30 की उम्र में बर्नआउट हो जाएगी। बच्चे को एंटीसेप्टिक बचपन नहीं चाहिए, उसे थोड़ी धूल, थोड़ी चोट, थोड़ा इंतजार, थोड़ी नाकामयाबी चाहिए। वही उसकी इमोशनल वैक्सीन है। वरना हम सबसे पढ़ी-लिखी, सबसे अकेली और सबसे नाजुक पीढ़ी पाल रहे हैं।












