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अनुभव: संसार का सबसे बड़ा गुरुकुल


डाक्टर दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
समन्वयक।आदर्श संस्कार शाला,भारत
आप देश के चर्चित लेखक,मोटीवेशन ट्रेनर,स्पीकर ,सामजिक कार्यकर्ता है

कोई भी डिग्री, कोई भी डिप्लोमा, कोई भी गुरुकुल आपको वो नहीं सिखा सकता जो एक ठोकर सिखा देती है। किताबें ज्ञान देती हैं, शिक्षक दिशा देते हैं, लेकिन जो चीज़ इंसान को मिट्टी से सोना बना देती है, वो है अनुभव। और अनुभव कभी मुफ्त में नहीं मिलता। उसकी फीस है: आवश्यकता, धैर्य, संयम और साहस।

1. आवश्यकता: पहला गुरु
जब पेट में भूख लगती है तो इंसान रोटी बनाना सीख जाता है। जब जेब खाली होती है तो कमाना सीख जाता है। आवश्यकता वो चिंगारी है जो सोए हुए सामर्थ्य को जगा देती है।

गुरुकुल में आपको बताया जाएगा कि आग कैसे जलानी है। पर जंगल में जब ठंड से हाथ कांप रहे हों और माचिस गीली हो गई हो, तब दो पत्थर रगड़कर आग पैदा करने की जिद ही अनुभव है। वो जिद किताब में नहीं लिखी होती।

धीरूभाई अंबानी ने पेट्रोल पंप पर नौकरी की। आवश्यकता थी। वही आवश्यकता उन्हें रिलायंस तक ले गई। कोई MBA कॉलेज ये हुनर नहीं देता।

2. धैर्य: समय का अनुशासन
बीज बोते ही फल नहीं मिलता। किसान जानता है कि उसे मिट्टी, पानी, धूप और सबसे ज़रूरी, इंतजार चाहिए। आज की दुनिया इंस्टेंट नूडल्स की दुनिया है। दो मिनट में सब चाहिए। पर अनुभव कहता है: रुको।

बांस का पेड़ 5 साल तक जमीन के नीचे जड़ें फैलाता है। ऊपर कुछ नहीं दिखता। लोग हंसते हैं। छठे साल वो 80 फीट बढ़ जाता है। धैर्य वो जड़ है जो दिखती नहीं, पर उसी पर असाधारण की इमारत खड़ी होती है।

एडिसन 10,000 बार फेल हुआ बल्ब बनाने में। किसी गुरुकुल में “फेल होना” सिलेबस में नहीं होता। पर उसने कहा, “मैं फेल नहीं हुआ, मैंने 10,000 तरीके खोजे जो काम नहीं करते।” ये धैर्य ही अनुभव का दूसरा नाम है।

3. संयम: मन का ब्रेक
साहस का मतलब हर बार तलवार निकालना नहीं होता। कभी-कभी तलवार म्यान में रखना सबसे बड़ा साहस है। संयम वो ताकत है जो आपको प्रतिक्रिया और जवाब में फर्क सिखाती है।

गुरुकुल में क्रोध प्रबंधन पर लेक्चर मिलेगा। पर जब आपका अपना बिजनेस डूब रहा हो, कर्मचारी गालियां दे रहे हों, घर में राशन खत्म हो, तब चिल्लाए बिना शांत दिमाग से हल ढूंढना, ये संयम कोई नहीं सिखाता। ये तब आता है जब आप टूटकर भी बिखरते नहीं।

महाभारत में अर्जुन ने संयम खोया तो गीता सुननी पड़ी। युधिष्ठिर ने संयम रखा तो धर्मराज कहलाए। संयम अनुभव से आता है, और अनुभव ठोकरों से।

4. साहस: डर के पार की दुनिया
डर सबको लगता है। फर्क बस इतना है कि साधारण इंसान डर के कारण रुक जाता है, और असाधारण इंसान डर के बावजूद चल देता है। साहस का मतलब डर का ना होना नहीं है। साहस का मतलब है डर के साथ आगे बढ़ना।

पहाड़ी पर चढ़ने का तरीका कोई किताब नहीं बताती। किताब बताएगी कि रस्सी बांधो, जूते पहनो। पर जब 10,000 फीट पर हवा सन्नाटी हो, नीचे खाई हो, और हाथ कांप रहे हों, तब एक कदम और आगे रखना, ये साहस गुरुकुल में नहीं बिकता।

कल्पना चावला करनाल के छोटे स्कूल से निकली। NASA तक का सफर साहस से तय हुआ। कोलंबिया हादसे से पहले वो जानती थी कि खतरा है। फिर भी गई। यही अनुभव का साहस है।

अब आते हैं 5 ‘अ’ पर: जो साधारण को असाधारण बनाते हैं

अनुभव: ये आपका निजी सिलेबस है। दुनिया आपको जज करेगी आपके मार्क्स से। पर जिंदगी आपको जज करेगी आपके अनुभव से। हर गिरना, हर उठना, हर धोखा, हर जीत, ये सब मिलकर आपका अनुभव बनाते हैं। ये नकल नहीं हो सकता।

अभ्यास: सचिन तेंदुलकर भगवान इसलिए नहीं बना कि टैलेंट था। वो इसलिए बना क्योंकि जब सब सो जाते थे, वो नेट्स में पसीना बहाता था। गुरुकुल आपको थ्योरी देगा। अभ्यास आपको खिलाड़ी बनाएगा। एक ही काम को 10,000 बार करना, तब जाकर हुनर आदत बनता है। आदत जब चरित्र बन जाए, तो दुनिया सलाम करती है।

अनुबंध: खुद से किया वादा। “चाहे कुछ हो जाए, मैं रुकूंगा नहीं।” ये अनुबंध कागज पर नहीं होता। ये दिल पर लिखा जाता है। दुनिया मुकर सकती है, पर जब आप खुद से मुकरते हो तो अनुभव मर जाता है। रोज सुबह 5 बजे उठने का अनुबंध, रोज 10 लोगों की मदद का अनुबंध, हार के बाद फिर कोशिश का अनुबंध, यही आपको भीड़ से अलग करता है।

अनुशासन: मन का आर्मी रूल। मन कहेगा “आज सो जा”। अनुशासन कहेगा “उठ, वादा किया था”। गुरुकुल में घंटी बजेगी तो क्लास लगेगी। जिंदगी में घंटी नहीं बजती। यहां सेल्फ-स्टार्ट होना पड़ता है। बिना बॉस, बिना टीचर, बिना डर के काम करना, ये अनुशासन अनुभव से ही आता है। फौजी इसलिए मजबूत नहीं कि बंदूक चलानी आती है। वो इसलिए मजबूत है क्योंकि 4 बजे उठना उसकी आदत है।

अनुष्ठान: इसे पूजा बना दो। जो काम करते हो, उसे इबादत समझो। लकड़हारा जब लकड़ी काटता है तो पसीने से भीग जाता है। पर वो अगर हर वार को मंत्र समझकर करे, तो वही काम तपस्या बन जाता है। स्टीव जॉब्स ने प्रोडक्ट नहीं बनाए, उसने अनुष्ठान किए। तभी iPhone पूजा की चीज लगा।

जमीनी से असाधारण तक का सफर

दुनिया में दो तरह के लोग हैं। एक जो किस्मत को कोसते हैं। दूसरे जो किस्मत बनाते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि दूसरे वाले लोगों ने अनुभव को अपना गुरु माना।

लता मंगेशकर को बचपन में घर से निकाल दिया गया था गाने के कारण। गुरुकुल होता तो शायद मना कर देता। पर आवश्यकता थी, धैर्य था, रियाज़ का अनुशासन था। 30,000 गाने, ये अनुष्ठान ही था। साधारण लड़की से “स्वर कोकिला” तक का सफर किसी डिग्री से नहीं, अनुभव से तय हुआ।

APJ अब्दुल कलाम अखबार बेचते थे। आवश्यकता थी। पढ़ाई का जुनून था। साहस था कि मछुआरे का बेटा रॉकेट साइंटिस्ट बनने का सपना देखे। संयम था कि राष्ट्रपति बनकर भी सादगी न छोड़ी। ये सब किसी IIT का सिलेबस नहीं था। ये जिंदगी का गुरुकुल था।

तो फिर कॉलेज-गुरुकुल बेकार हैं?
नहीं। वो नींव देते हैं। पर मकान आपको खुद बनाना है। वो नक्शा देते हैं, जमीन आपको खुद खरीदनी है। वो बीज देते हैं, खेत आपको खुद जोतना है।

डिग्री आपको इंटरव्यू तक ले जाएगी। अनुभव आपको बोर्डरूम तक ले जाएगा। डिग्री आपको नौकरी दिलाएगी। अनुभव आपको कंपनी का मालिक बनाएगा।

अंतिम बात: कलमतोड़ सच

जिंदगी की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी के चार दरवाजे हैं:

  1. दुख का दरवाजा: यहां धैर्य मिलता है
  2. असफलता का दरवाजा: यहां साहस मिलता है
  3. धोखे का दरवाजा: यहां संयम मिलता है
  4. जिम्मेदारी का दरवाजा: यहां आवश्यकता समझ आती है

इन चारों दरवाजों से जो गुजर जाता है, उसे फिर किसी गुरुकुल की जरूरत नहीं पड़ती। वो खुद एक चलता-फिरता गुरुकुल बन जाता है।

इसलिए उठो। गिरो। सीखो। फिर उठो। अभ्यास करो। अनुबंध निभाओ। अनुशासन रखो। काम को अनुष्ठान बना दो।

क्योंकि इतिहास गवाह है: दुनिया की हर असाधारण कहानी एक साधारण इंसान से ही शुरू हुई थी। फर्क सिर्फ अनुभव का था।

और अनुभव, मेरे दोस्त, बाजार में नहीं बिकता। वो कमाना पड़ता है। एक-एक ठोकर, एक-एक आंसू, एक-एक रात की नींद की कीमत पर।

यही वो कीमत है जो आपको भीड़ से अलग कर देती है। यही वो रास्ता है जो जमीनी इंसान को आकाश की बुलंदी तक ले जाता है।

बस याद रखना: गुरुकुल आपको पढ़ा सकता है, पर गढ़ नहीं सकता। गढ़ते आप खुद हो, अपने अनुभव से।

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