
आओ सुनाएं गुरु टैगोर जी की कहानी
सुनी थी जो मैं औरों की जुबानी
एक महान भारतीय कवि, संगीतकार और समाज सुधारक थे
जिनको गुरुदेव के नाम से जाना जाता था
कोलकाता में अवतरित हुए 7 मई 1861 जोड़ासांको ठाकुरबाड़ी में
पिता देवेंद्र नाथ टैगोर और माता शारदा देवी के आंख के तारे थे
सेंट जेवियर स्कूल और यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन से कानून की पढ़ाई की
8 वर्ष की उम्र में ही पहली कविता
लिख डाली
गीतांजलि के लिए नोबेल पुरस्कार मिला
वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे
जिन्होंने कला साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में अमूल्य योगदान दिया
इनकी प्रमुख कृतियां -‘गोरा, घरे बाइरे, काबुलीवाला थी
1901 में शांतिनिकेतन में प्रायोगिक स्कूल की स्थापना की
जो 1921 में विश्व भारती विश्वविद्यालय बना
इन्होंने भारतीय साहित्य को शास्त्रीय संस्कृत से मुक्त किया
उन्होंने आधुनिक, गद्य और बोलचाल की भाषा में समृद्ध किया
‘जन गण मन’से जगाई देश में चेतना
‘आमार सोनार बांग्ला’ से बांग्लादेश को दी अपनी प्रेरणा
टैगोर जी कवि ही नहीं, ऋषि थे कलयुग के
जिन्होंने देश की माटी में रचा था संगीत
‘एकला चलो रे’का मंत्र देकर सिखाया सबको हौसलों का गीत
साहित्य ,संगीत,कला और शिक्षा
हर क्षेत्र में दीप जलाते रहे
हे विश्व कवि, हे गुरुदेव, आपको कोटि-कोटि नमन!!
डॉ मीना कुमारी परिहार











