डाक्टर दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
लोकमाता अहिल्याबाई होलकर का स्मरण करते ही भारतभूमि पर मातृशक्ति का वह रूप प्रकट होता है जिसमें वात्सल्य और वार दोनों एक साथ बसते हैं। उनके अट्ठाईस वर्ष का शासन केवल धर्मशाला और घाटों की कथा नहीं, वह रणभूमि की वह गाथा भी है जहाँ एक माता ने तलवार उठाकर सिद्ध किया कि करुणा जब कर्तव्य से जुड़ती है तो चंडी बन जाती है। उनका चरित्र युद्ध कौशल का वह पारसमणि है जिसने लोहे को भी स्वर्ण बना दिया।
जब मल्हारराव होलकर ने कुम्हेर के दुर्ग पर आक्रमण किया, तब बालिका अहिल्या ने युद्ध की नीति पहली बार निकट से देखी। पति खंडेराव वीरगति को प्राप्त हुए, पर अहिल्या ने आँसू नहीं बहाए। उन्होंने अपने आँचल में शस्त्र छिपा लिए। ससुर की मृत्यु के बाद जब गंगोबा तात्या ने बालक मालेराव को कठपुतली बनाकर सत्ता हथियानी चाही, तब यह माता मौन नहीं रही। उन्होंने पत्र लिखा कि राज्य की रक्षा के लिए मैं स्वयं कमर कस चुकी हूँ। यदि कोई लोभ से आगे बढ़ेगा तो उसे मेरी तलवार का सामना करना होगा। यह चेतावनी नहीं, संकल्प था। गंगोबा का षड्यंत्र टूट गया। उन्होंने सिद्ध किया कि राजनीति का सबसे बड़ा शस्त्र आत्मबल है।
राघोबा दादा जब विशाल सेना लेकर मालवा पर चढ़ आए, तब दरबार में भय छा गया। मंत्रियों ने कहा कि संधि कर लीजिए। तब अहिल्या ने श्रृंगार त्यागा, श्वेत वस्त्र धारण किए और हाथी पर सवार होकर सेना के सम्मुख आ खड़ी हुईं। उनके पास न बड़ी तोपें थीं, न अपार सेना। पर उनके पास प्रजा का विश्वास था। उन्होंने सेना से कहा कि यह भूमि मेरी नहीं, तुम्हारी माता की है। आज माता अपनी संतान से रक्षा माँग रही है। वे स्वयं व्यूह रचना के केंद्र में खड़ी हुईं। स्त्रियों ने घर से अनाज भेजा, किसानों ने अपने बैल युद्ध सामग्री ढोने को दिए। राघोबा ने देखा कि वह किसी रानी से नहीं, जनशक्ति से लड़ रहा है। बिना युद्ध के ही वह लौट गया। यह कूटनीति थी, यह मनोवैज्ञानिक विजय थी। अहिल्या ने बिना रक्त बहाए रण जीत लिया।
उनका युद्ध कौशल केवल मैदान में नहीं, दुर्ग प्रबंधन में भी था। महेश्वर का किला उन्होंने अभेद्य बनाया। किले की दीवारें ऐसी कि तोप के गोले टकराकर लौट जाएँ। नर्मदा के घाट से किले तक गुप्त सुरंगें बनवाईं, जिससे संकट में प्रजा सुरक्षित निकल सके। उन्होंने प्रत्येक गाँव में स्वयंसेवक नियुक्त किए जो सूचना तंत्र का कार्य करते। शत्रु की चाल की खबर उन तक पवन से पहले पहुँचती। उन्होंने कहा कि युद्ध लड़ने से पहले युद्ध टालने का प्रयत्न करना राजधर्म है। इसलिए उन्होंने भीलों और गोंडों से मित्रता की, उन्हें सेना में स्थान दिया। जंगल उनका कवच बन गए।
उनके पास तुकोजीराव होलकर जैसा सेनापति था, पर सेनापति का चयन ही उनकी दूरदर्शिता थी। उन्होंने संबंध नहीं, शौर्य देखा। तुकोजीराव को खुली छूट दी कि रण का निर्णय वही लें, पर नीति का निर्धारण अहिल्या स्वयं करतीं। जब तुकोजीराव लद्दाख तक मराठा ध्वज ले गए, तब अहिल्या ने कहा कि विजय का उत्सव नहीं मनाना, वहाँ भी अन्नसत्र खोलना। युद्ध भूमि को धर्मभूमि बना देना, यही उनका रण कौशल था।
वे जानती थीं कि तलवार की धार से अधिक पैनी दृष्टि होती है। उन्होंने गुप्तचर व्यवस्था ऐसी बनाई कि शत्रु के शिविर में क्या पक रहा है, इसकी सूचना उनके भोजनालय तक आ जाती। पर उन्होंने कभी छल का सहारा नहीं लिया। उनका उद्घोष था कि धर्मयुद्ध में अधर्म का शस्त्र नहीं उठाऊँगी। इसीलिए उनके शत्रु भी उनका सम्मान करते।
मथुरा-वृंदावन की रक्षा के लिए उन्होंने यमुना के घाटों पर ऐसी दीवारें उठवाईं जो बाढ़ भी रोकें और आक्रमण भी। कलकत्ता के मार्ग में बनवाए पुल ऐसे थे कि सेना भी निकल जाए और व्यापार भी बढ़े। धर्मशाला केवल यात्रियों के लिए नहीं थी, संकट में वही सैनिक छावनी बन जाती। उनका हर निर्माण दोहरा कवच था, श्रद्धा का भी और सुरक्षा का भी।
अहिल्याबाई का जीवन बताता है कि मातृशक्ति केवल सृजन नहीं करती, संहार भी जानती है जब धर्म पर संकट हो। वे दुर्गा का वह स्वरूप थीं जो एक हाथ में कमल रखती हैं तो दूसरे में खड्ग। उनके लिए युद्ध अंतिम विकल्प था, पर जब विकल्प न बचे तो वे स्वयं कालिका बन जाती थीं।
हे लोकमाता, तुम शक्ति का वह अनंत रूप हो जिसमें ममता की शीतलता और रणचंडी की ज्वाला एक साथ जलती है। तुमने सिद्ध किया कि युद्ध कौशल केवल अस्त्र चलाना नहीं, प्रजा को अजेय बना देना है। तुमने तलवार उठाई तो धर्म की रक्षा के लिए, रख दी तो करुणा की वर्षा के लिए। तुम्हारा चरित्र वह पारसमणि है जिसके स्पर्श से कायर भी वीर हो जाता है और वीर भी विनम्र। जब तक भारत में माताएँ बेटों को तुम्हारी लोरी सुनाएँगी, तब तक कोई शत्रु इस धरती की ओर आँख नहीं उठा सकेगा। तुम रण में भी माता थीं, सिंहासन पर भी माता थीं। तुम्हारा नाम हीरे के अक्षरों में नहीं, हर सैनिक के हृदय की धड़कन में अंकित है। शत-शत नमन।











