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तलाश करता हूं

सपने में मैं, मुकद्दर तलाश करता हूं,
खड़ा हूं जमीं पर, और जमीं तलाश करता हूं।

निकल पड़ा हूं लेकर दीया, मैं रौशनी ढूंढने,
अभी मैं जिन्दा हूं, जिन्दगी तलाश करता हूं।

जाम हाथ में है, मना रहा हूं होठों को,
कोई साथ दे ऐसा, एक अजनबी तलाश करता हूं।

गई है सूख वो सागर, दिल में जो गहरी थी,
गीला करने मैं होठों को, अब सावन तलाश करता हूं।

थी मिली जब वो मुझे, चेहरे पे तिल एक काला था,
अरसे बीत गए देखे, मैं वो चेहरा तलाश करता हूं।

फुलों की राहों से, गुजरे हो गए हैं कितनी शाम,
कली खिल रही जहां, मैं वो चमन तलाश करता हूं।

उनकी मुस्कुराहटों ने, लूट लिया था जिगर मेरा,
अब जीने के लिए मैं, वो जिगर तलाश करता हूं।

मिटा दे जो विषमता को, कंपा दे रूह उस अधम का।
मिटा दे हर उस रावण को, मैं वो खंजर तलाश करता हूं।

“”रवि भूषण “”

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