
यह केवल तंबाकू नहींं,
हमारी मौत की पुडि़याँ है।
यह निशदिन जोड़ती रहती,
नित मौत की सारी कडि़याँ है।।
गांंजा,भांग व शराब,तंबाकू,
ये सब बर्बादी की पुडि़याँ है।
अपराधो की राह दिखलाती,
वो कलह की सारी छडि़याँँ है।।
सदैव नशा नाश का द्वार है,
मानवता का करता संंहार है।
रिश्तो को करता तार तार है,
जीवन को बनाता यूं ग्रास है।।
यहाँ पर धुऐं के गुब्बार में,
मन्नू सांसे उखड़ती जाती है।
वो हमारे इस श्वसन तंत्र की,
निरंतर सूरत बदलने लगती है।।
सोचने,समझने की शक्ति भी,
इससे कमजोर होने लगती है।
तंबाकू के नित्य सैवन करने से,
हमारी काया सिकुड़ने लगती है।।
जब भी हमको भूख लगती,
हम तंबाकू,खैनी चबाते है।
आलस हमारा बढता जाता,
आँँखो में अंधेरा छाने लगता है।।
बचपन हमारा यूं बित जाता,
हमारा यौवन ढलने लगता है।
आज समय से पहले ही हमको,
अपना यूं बुढा़पा नज़र आता है।।
मुन्ना राम मेघवाल ।
कोलिया,डीडवाना,राजस्













