
दो जून की रोटी,
बड़ी मुश्किल से है आई।
कड़ी मेहनत की पिता ने,
थककर भी न ली अंगड़ाई।
खून पसीना बहाकर ,
जोड़ा पाई- पाई,
दो जून की रोटी के लिए,
हालातों से की लड़ाई।
परिवार का करने पोषण,
मां ने बड़ी हिम्मत दिखाई
चूल्हा में आग जलाकर,
खुशी- खुशी रोटी पकाई।
ख़ुद भूखी रहकर,
सबको भर पेट खिलाई।
किस्मत से मिलती है दो जून की रोटी,
इसका मोल समझ लो मेरे भाई।।
ममता साहू कांकेर छत्तीसगढ़













