
समय का पहिया चलता जाय,
कई मन अभिलाषा क्या करूं?
ईश्वर ने मुझे लायक किया,
बस कुछ समाज को सौंप सकूँ।
भले पथ कंटक,है कठिन डगर,
निर्जन वन पर, मैं क्यों रुकूं?
धर्म का दीप, कर्म की ज्योति,
औ ईश कृपा ले बढ़े चलूँ।।
भगवान दास शर्मा “प्रशांत”
इटावा उत्तर प्रदेश













