
साहित्य समाज का दर्पण है। यह न सिर्फ युग का प्रतिबिंब दिखाता है, बल्कि आने वाले समय की दिशा भी तय करता है। कबीर के दोहों ने पाखंड पर चोट की, प्रेमचंद की कहानियों ने किसान और मजदूर का दर्द कहा, तो मंटो ने बंटवारे का नंगा सच लिखा। दिनकर ने सत्ता को ललकारा—’सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’। साहित्यकार का काम सिर्फ कल्पना रचना नहीं, समाज की विसंगतियों को उजागर करना और सच बोलने का साहस दिखाना है। लेकिन आज के दौर में जब सच बोलना ही सबसे बड़ी चुनौती बन गया है, तब साहित्यकार की भूमिका और कठिन हो गई है। साहित्यकार के पास वह दृष्टि होती है जो आम आंखों से ओझल है। वह सत्ता, धर्म, जाति और बाजार के गठजोड़ को पहचानता है और शब्दों से उसे बेपर्दा करता है।
भक्तिकाल में कबीर-रैदास ने जाति-व्यवस्था पर प्रहार किया। स्वाधीनता आंदोलन में भारतेन्दु, मैथिलीशरण गुप्त और सुभद्रा कुमारी चौहान ने कलम से क्रांति की।आपातकाल में नागार्जुन, धूमिल और रघुवीर सहाय ने सत्ता के दमन को कविताओं में दर्ज किया। समकालीन उदाहरण देखते है। उदय प्रकाश की ‘मोहनदास’ दलित उत्पीड़न दिखाती है। गीतांजलि श्री का ‘रेत समाधि’ बंटवारे और स्त्री-जीवन की परतें खोलता है। पेरुमल मुरुगन का ‘मादोरुबागन’ जातीय कुरीतियों पर सवाल उठाता है। यानी साहित्यकार हमेशा हाशिये पर खड़े लोगों की आवाज बनता है। वह हमें बताता है कि विकास की चकाचौंध में कौन पीछे छूट रहा है। वर्तमान में साहित्यकार के सामने नयी नयी चुनौतियाँ उभरकर आ रही है। आज का समय पहले से कहीं अधिक जटिल है। आईना दिखाना आसान नहीं रहा। अभिव्यक्ति पर अदृश्य सेंसर हावी नजर आता है। सीधी सेंसरशिप नहीं है, पर ‘ट्रोल आर्मी’, मुकदमे और बहिष्कार का डर तो बना रहता है। पेरुमल मुरुगन को धमकियों के बाद ‘लेखक पेरुमल मुरुगन मर चुका है’ लिखना पड़ा। सलमान रुश्दी पर हमला, गौरी लंकेश की हत्या—ये घटनाएं कलम को डराती हैं। साहित्यकार सोचता है—क्या लिखूं, क्या छोड़ दूं? लेखकों पर बाजार का दबाव भी बढता जा रहा है। आज प्रकाशक वही छापना चाहता है जो बाजार में बिके। प्रेम, अपराध, सेल्फ-हेल्प की किताबों की बाढ़ है। दलित साहित्य, आदिवासी साहित्य, स्त्री-विमर्श जैसी धाराएं मुख्यधारा से आज बाहर हैं। पुरस्कार और रॉयल्टी का गणित रचनात्मकता को प्रभावित कर रहा है। ‘बेस्टसेलर’ बनने की होड़ में साहित्यकार कई बार समझौता कर लेता है। सोशल मीडिया का शोर सुनाई दे रहा है। पहले अखबार-पत्रिकाओं में गंभीर बहस होती थी। अब 280 अक्षरों में राय बनती-बिगड़ती नजर आती है। ट्रेंड और मीम के दौर में धैर्य से उपन्यास पढ़ने वाले कम हैं। साहित्यकार के सामने सवाल है—क्या वह रील के जमाने में रचना के लिए पाठक बचा पाएगा? वर्तमान समय में ध्रुवीकरण और लेबलिंग की प्रवृति बढती जा रही है। आज आप अगर सत्ता से सवाल करते हैं तो ‘देशद्रोही’, अगर परंपरा पर सवाल उठाते हैं तो ‘संस्कृति-विरोधी’ का ठप्पा लग जाता है। बीच का रास्ता नहीं बचा। इससे साहित्यकार या तो चुप हो जाता है, या किसी एक खेमे का होकर रह जाता है। आईना तब धुंधला पड़ जाता है। भाषा और अनुवाद का संकट बढता जा रहा है। अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ रहा है। हिंदी और भारतीय भाषाओं में लिखने वाले को राष्ट्रीय पहचान मुश्किल से मिलती है। अच्छे अनुवाद के अभाव में केरल का साहित्य असम तक नहीं पहुंचता, और मणिपुर की कविता गुजरात नहीं सुन पाती।
फिर भी उम्मीद बाकी है। तमाम चुनौतियों के बाद भी साहित्यकार हार नहीं मान रहा। आज डिजिटल माध्यम नए रास्ते खोल रहे है। ब्लॉग, किंडल, यूट्यूब, पॉडकास्ट—नए लेखकों को मंच मिल रहा है। ‘कविता कोश’, ‘प्रतिलिपि’ जैसे प्लेटफॉर्म गांव-कस्बे की प्रतिभा सामने ला रहे हैं। इंस्टाग्राम पर युवा कवि लाखों लोगों तक पहुंच रहे हैं।
प्रतिरोध का साहित्य आज भी जिंदा है। किसान आंदोलन पर दर्जनों कविताएं लिखी गईं। शाहीन बाग, CAA-NRC, मणिपुर हिंसा पर कहानियाँ-कविताएं आईं। यानी जब-जब समाज करवट लेता है, साहित्यकार की कलम चलती है।
वर्तमान में कई युवा लेखक पुरस्कारों की परवाह किए बिना दलित, आदिवासी, क्वीयर अनुभव लिख रहे हैं। ‘सेल्फ पब्लिशिंग’ ने प्रकाशक की मोहताजी खत्म की है।
निष्कर्ष: साहित्यकारोंं को आईना इस तरह साफ रखना होगा कि जिससे समाज को स्पष्ट दिखलायी भी देता रहे और समुचित मार्गदर्शन भी मिलता रहे। साहित्यकार का पहला और एकमात्र धर्म है सच के प्रति निष्ठा। तुलसीदास ने कहा था—’समरथ को नहिं दोष गुसाईं’। पर साहित्यकार का काम है समरथ को भी दोष दिखाना। आज जरूरत है कि समाज साहित्यकार को ‘गोदी लेखक’ या ‘एंटी-नेशनल’ के खांचे में न बांटे। उसे सवाल पूछने की आजादी दे। और साहित्यकार को भी याद रखना होगा कि वह न सत्ता का चारण बने, न बाजार का गुलाम। प्रेमचंद ने कहा था—’साहित्यकार देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं, बल्कि आगे मशाल दिखाने वाली सच्चाई है।’ जब तक एक भी कलम सच बोलने का जोखिम उठाएगी, तब तक समाज का आईना साफ रहेगा। और जिस दिन आईने डरकर झूठ दिखाने लगेंगे, समझिए उस दिन से समाज अंधा होने लगा है। इसलिए चुनौतियों के बीच भी साहित्यकार को लिखते रहना होगा—क्योंकि अगर वो चुप हुआ, तो आने वाली पीढ़ियों के पास कोई भी आईना नहीं बचेगा। सच्चा लिखिए, अच्छा लिखिए और निरंतर लिखते रहिए।।
मुन्ना राम मेघवाल ।
कोलिया,डीडवाना,राजस्थान।













