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स्वास्थ्य सबका अधिकार, पर इलाज क्यों बीमार ?

मरीज़ों को नहीं मिलती है कोई राहत ज़माने में,
पर इलाज क्यों बीमार है, सारे दवाखाने में।
​लिखा है हर जगह ‘स्वास्थ्य सबका अधिकार है ‘,
मगर क्यों ज़िन्दगी बिकती है यहाँ पैसे कमाने में?

​अमीरों को तो मिल जाता है सब वक़्त पर लेकिन,
ग़रीबों की उमर कटती है बस पर्ची कटाने में।
​दवा की क़ीमतें सुनकर ही दिल घबरा सा जाता है,
कमाई डूब जाती है यहाँ साँसें बचाने में।

​बनाए जा रहे हैं रोज़ नए आलीशान हस्पताल,
मगर इंसानियत ही खो गई है नोट कमाने में।
​दुआ और दवा का रिश्ता यहाँ व्यापार बन बैठा,
मसीहा व्यस्त हैं अब तिजोरियाँ अपनी बढ़ाने में।

​जहाँ पर ज़िन्दगी को ज़िन्दगी की आस होती है,
वहाँ मासूम रोते हैं ज़रा सी फीस चुकाने में।
​कहीं पर बेड ख़ाली हैं तो वेंटिलेटर की है किल्लत,
कई साँसें ही थम जाती हैं बस चक्कर लगाने में।

​अधिकारों के काग़ज़ पर तो सब कुछ ठीक दिखता है,
हक़ीक़त और है पर सामने जनता के आने में।
​ये कैसी बेबसी है देखना ‘रीना’ ज़रा चलकर,
सिसकती है दुआ चौखट पे, दम घुटता दवाखाने में।

           रीना पटले, शिक्षिका 
   शासकीय हाई स्कूल ऐरमा, कुरई 
        जिला, सिवनी, मध्यप्रदेश

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