
क्या ज़माना था वो, थे सबमें जज़्बात,
सब सच्चे थे, करते थे मीठी-मीठी बात।
न जाने कहाँ खो गए, भाव और सद्भाव,
विचार बदल ही गए, देखते-देखते॥
संबंधों में थी मधुरता, न थी कोई चतुरता,
होते थे मन प्रफुल्लित, रिश्तों में थी कोमलता।
मिलने-मिलाने की एक सुंदर रीति भी थी,
सब ख़त्म हो गया, देखते-देखते॥
परिवार संयुक्त था, माता-पिता की छत्रछाया थी,
पैसे कम थे भले, भरपूर भाईचारा थी।
वो आँगन, वो चौपाल, वो अपनापन कहाँ,
सब कहाँ खो गया, देखते-देखते॥
जनसंख्या कम थी यहां, ग़म किसी को न थी,
शुद्ध अन्न की ऊपज, कोई रसायन न थी।
होते थे सब बलिष्ठ, आज कमज़ोर हैं,
क्या से क्या हो गया, देखते-देखते॥
धूल-धुआँ कम था, सवारी थी बैलगाड़ी,
तन में किसी के न थी, कोई बड़ी बीमारी।
थी सादा जीवन, कोई दिखावा न था,
सब बदल ही गया, देखते-देखते॥
चिट्ठी आती थी, डाकिए का इंतज़ार था,
अपनों की कुशल-क्षेम को दिल बेकरार था।
अब तो मोबाईल के त्वरित संवाद में,
प्रेम का दौर ही गया, देखते-देखते॥
शहर कम थे यहाँ, ग्रामीण क्षेत्र ज़्यादा थे,
मिल-जुलकर रहें, सच्चे इरादे सबके थे।
आदर, प्रेम, गरिमा, अब दिखते नहीं,
शिष्टता खो गई, देखते-देखते॥
पेड़-पौधों और जंगलों से सजी थी धरती,
मकान कम थे यहाँ, हर तरफ़ हरियाली थी।
पक्षियों का मधुर कलरव, अब सुनाई देता नहीं,
गर्मी बेतहाशा बढ़ी, देखते-देखते॥
रवि भूषण वर्मा













