
हे मानव आर्त नाद कर धरती पुकार रही,
बार बार प्रकृति भी तुमको समझा रही,
तुम खुद अपने हाथों से न करो बर्बादी,
सब तबाह हों जायेगा, न बचेगी आबादी।
कभी बाढ़, कभी सूखा ये सब सहना होगा,
और भूकंप जैसी आपदा भी देखना होगा,
इसलिए समझाते हैं हरियाली और पानी बचाओ –
वरना इसका परिणाम अगली पीढ़ी की भोगना होगा।
सुन्दर बाग बगीचे सजे हैं इस धरती पर,
खूबसूरत वादियों का नजारा दिखता है इस धरती पर,
नदियों की कल कल धारा बहती है इस धरती पर,
मानव जीव जंतु सब का ठिकाना इस धरती पर।
क्या फर्ज हमारा नहीं बनता कि पेड़ उगाएं धरती पर,
दूर करें प्रदुषण, स्वच्छता लाएं धरती पर,
अगर आज से ही हमने धरती माँ का दर्द नहीं देखा,
सभी नष्ट हों जायेगा कुछ न बचेगा धरती पर।
कितनी धन सम्पदा का भण्डार है इस धरती पर,
कितने पेड़ पौधों से मिलती हैं दवाइयाँ इस धरती पर,
माँ कि तरह पोषण करती ये हमारी धरती माँ,
हरियाली से इसका श्रृंगार करें, स्वर्ग लाये इस धरती पर।
प्रभा बच्चन श्रीवास्तव
जबलपुर मध्यप्रदेश













