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साइकिल का पुनः लौटता गौरव

एक समय था जब साइकिल,
हर आँगन की शान थी।
गाँव की पगडंडी से लेकर,
शहर तक उसकी पहचान थी।

बच्चों की खुशियों की साथी,
युवाओं का अभिमान थी।
किसानों, मजदूरों के जीवन में,
साइकिल ही वरदान थी।

फिर समय बदला धीरे-धीरे,
मोटर गाड़ियों का दौर आया।
चमक-दमक और तेज़ रफ़्तार ने,
साइकिल को पीछे हटाया।

लेकिन आज ईंधन संकट ने,
फिर सबको यह बात बताई।
सादगी में ही शक्ति छिपी है,
साइकिल ने फिर याद दिलाई।

न पेट्रोल की चिंता इसमें,
न बढ़ती कीमतों का भार।
स्वास्थ्य, बचत और पर्यावरण का,
यह देती सुंदर उपहार।

जो कभी उपेक्षित हो बैठी थी,
वह फिर सम्मान पा रही है।
धरती को स्वच्छ बनाने की,
नई राह दिखा रही है।

आओ फिर से इसे अपनाएँ,
जीवन को सरल बनाएँ।
साइकिल के संग स्वस्थ रहें,
और हरित भविष्य सजाएँ।

डॉ. दीप्ति खरे
मंडला(मध्य प्रदेश)

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