
मन चंगा तो कसौटी में गंगा, बात पुरानी, पर सत्य महा,
निर्मल मन के आगे फीका, हर तीर्थ, हर पूजा, हर धाम।
क्या होगा गंगाजल लाकर, यदि मन में कलुष भरा हो?
क्या होगा दीपक जलाकर, यदि भीतर ही अँधियारा हो?
मन के कोने-कोने में जब, प्रेम की धारा बहती है,
तब मिट्टी का एक पात्र भी, गंगा जैसा पावन लगता है।
जब करुणा आँखों में सजती, और वाणी मधुर होजाती हैं, तब ईश्वर की छवि हर चेहरे में, सहज स्वयं मुस्काती है।
नहीं ज़रूरी दूर निकलना, तीर्थों की राह पकड़ लेना, पहले अपने मन को धोना, फिर प्रभु का आशीष लेना।
जिसने मन का मैल मिटाया, उसने सच्चा स्नान किया, जिसने सबको अपना माना, उसने जीवन का ज्ञान लिया।
मन में यदि सद्भाव खिले तो, पत्थर भी भगवान बने,
द्वेष जले जब प्रेम-अग्नि में, सूने घर वरदान बने।
आओ ऐसा मन रच लें हम, जहाँ न छल हो, न अभिमान, “मन चंगा तो कसौटी में गंगा” यही जीवन का सच्चा ज्ञान।
निर्मल मन की इस गंगा में, हर दिन स्वयं को डुबोएँ हम, मानवता की पूजा करके, जीवन को सफल बनाएँ हम।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र













