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कविता – वीर रस


खोज के बीज पैदा हो गये खड़ावदा की धरती पर
मन करता फूल चढ़ा दूँ ग्राम पंचायत की अर्थी पर
बहुत से उल्लू बैठे हैं मेरे गांव में
जो जहाँ बैठे वहीं छेद करते नाव में
आज कुछ कर्महीनों की वजह से सजा भुगत रहा पूरा गांव
बहुत से बुगला भक्त बैठे हैं नीम और पीपल की छांव में
आज पूरी तरह रसातल में पहुंच गया मेरा गांव
अब क्या फ़ायदा यूं ही बैठना फूटी नाव में
ईमानदार इज्जतदार डूब मैं जा रहे
देखो चमचे चाटूकार मौज उड़ा रहे
अब देखो खड़ावदा में नेता करते खींचतान
अच्छे-अच्छों का गिर गया मान सम्मान
बस शिशी पुत्रों की वजह से अलग ही है खड़ावदा की पहचान
पर अब बहुत हुआ, अब जागो वीर जवान
तोड़ दो जंजीरें, छोड़ो डर का नाम
हुंकार भर दो ऐसी, काँपे सारा जहान
ये धरती चम्बल वाली, वीरों की खान
यहाँ जन्मे मुकेश प्रजापति जैसे बलिदान
फिर क्यों सो रहे हो, उठो शमशीर तान
जो छेद करें नाव में, उनको सबक दो ऐसा
पूछे दुनिया सारी, खड़ावदा में विद्रोह हुआ कैसा
एक जुट होकर लिख दो, नई क्रांति का फरमान
भ्रष्टाचार की लंका में, लगा दो आग तुम
शिव तांडव कर दो, मिटा दो पाप तुम
याद रखो विद्रोही का, यही है आखिरी ऐलान
या तो बदल दो खड़ावदा, या बदल दो अपनी जान

कवि:- गोपाल जाटव विद्रोही खड़ावदा तह गरोठ जिला मन्दसौर मध्यप्रदेश

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