
मैं तो बस लुटता ही आय
साम्राज्य नहीं बनवास मिला
जंगल का आवास मिला
माता का परिहास मिला
जनता का उपवास मिला
तब से मैं घुटता ही आया
सीता हरण रावण ने किया
असह्य दुखों का बोझ दिया
दर दर भटका मारा मारा
नहीं किसी ने खोज दिया
फिर भी मैं चलता हीआया
बन से लौट के सीता खोया
राजा था न तनिक न रोया
लव कुश को छाती से लगाया
पश्चाताप से पाप को धोया
तिल तिल कर गलता ही आया
मुग़लों ने मेरे घर को तोड़ा
सत्ता ने मेरा साथ था छोड़ा
न्यायालय में लड़ते लड़ते
न्याय मिलेगा आस को छोड़
अपनो से ही लड़ता आया
संघर्षों से घर को पाया
तम्बू से जब उसमें आया
रक्षक ने है लूट मचाया
मैं तो बस लुटता ही आय
मैं तो बस लुटता ही आया
महेंद्र कुमार मधुकर













