ग़म की दौलत को ज़माने से छिपाते रहिये
दर्द के साज को चुपचाप बजाते रहिये
रात भर नींद का दरवाजा खुले या न खुले
अपनी पलकों में कोई ख्वाब सजाते रहिये
मौन की गूँज भी इक रोज सुनेगी महफिल
सिर्फ होठों को सलीके से हिलाते रहिये
ये अँधेरा भी किसी मोड़ पे मुड़ जायेगा
मन के आँगन में नई भोर उगाते रहिये
जिसकी ठोकर से चटकती है काँच की दुनिया
ऐसे जज़्बात से दिल अपना बचाते रहिये
ज़िन्दगी प्यार के साँचे में ढली है “पंकज”
प्यार मिलता है अगर प्यार लुटाते रहिये
पंकज बुरहानपुरी













