
कलयुग की इस नई दुनियाँ का नया ये संस्कार है
पैसे दंभ ताकत का ही सारा घमंड अहंकार है
देश दुनियाँ धरा से नहीं इन्हे रत्तीभर सरोकार है
अपनी भैस अपनी लाठी दुनियाँ सारी लाचार है
ईश्वर की नेमत अदभुत सुंदरता से परिपूर्ण ये धरा है
फूल पौधे नदी तालाब झरने पशु पक्षी तरह तरह की नैसर्गिकता से भरा है
एक दूसरे पर वर्चस्व की गंदी ये लड़ाई है
अंजाम इंसानी वजूद पर ही बन आयी है
प्रेम मोहब्बत सहृदयता का स्थान अब इंसानी रसूख ने ले लिया
ताकत की मद में चूर इंसान खुद को ही रब मान लिया
शैतानी इस धरा का है मालिक अब तू ही रखवाला है
बारुद के ढेर पर बैठी अंधकार से भरी दुनियाँ मे नही कोई उजाला है
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र













