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बचपन और आइसक्रीम।

बचपन की उन तपती गर्मियों में मोहब्बत का मतलब कोई बड़ा इकरार नहीं, बल्कि अपनी मैंगो आइसक्रीम का सबसे मीठा और मलाईदार हिस्सा चुपचाप सामने वाले को दे देना होता था। दोपहर की उस कड़कड़ाती धूप में जब गली के मोड़ से आइसक्रीम वाले की घंटी की ‘टिन-टिन’ सुनाई देती, तो पैरों में चप्पल पहनने तक का सब्र नहीं होता था। हम दोनों नंगे पाँव ही तपती हुई सड़क पर दौड़ पड़ते थे। मुट्ठी में भींचे वो चंद सिक्के और सामने पिघलती हुई पीली मैंगो आइसक्रीम, बस यही हमारी कुल कायनात थी।
मुझे आज भी याद है, एक दोपहर जब आइसक्रीम की डंडियों से रस टपक रहा था, तुमने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों में बेइंतहा मासूमियत भरकर कहा था— “सुनो, हमारी मोहब्बत बिल्कुल इस आइसक्रीम जैसी है—मीठी और ठंडी। जैसे इसमें चीनी घुली है, वैसे ही तुम मुझमें समा गए हो।”
तुम्हारी इस दार्शनिक बात पर भावुक होने के बजाय मेरी शैतानी जाग उठी थी। मैंने हँसते हुए तुम्हारी आइसक्रीम से एक बड़ा सा बाइट लिया, तो तुम एकदम से तुनक कर बोलीं— “ये मोहब्बत है या मेरी आइसक्रीम हड़पने की साजिश? प्यार में कुर्बानियाँ दी जाती हैं, तुम तो मेरा ‘मैंगो फ्लेवर’ ही उड़ा ले गए!” तुम्हारा वह रूठना और मेरा तुम्हें मनाने के लिए अपनी आइसक्रीम आगे कर देना, उस वक्त का सबसे बड़ा समझौता हुआ करता था।
आज वक्त बदल चुका है। जब भी किसी महंगे पार्लर में सलीके और तहज़ीब के साथ खाते हुए बैठते हैं, तो वो पुरानी यादें अपने आप ताज़ा हो जाती हैं। अब एयर-कंडिशंड कमरों में आइसक्रीम पिघलने का डर नहीं होता और न ही उसे जल्दी-जल्दी खत्म करने की कोई हड़बड़ी होती है। पर सच कहूँ, तो उस सलीके के बीच वो बेसाख्तापन कहीं खो गया है। अब आइसक्रीम तो पूरी मिल जाती है, पर तुम्हारे हिस्से की आइसक्रीम चुराने की जो ‘मीठी’ जद्दोजहद थी… वही तो हमारी ज़िंदगी की असली मिठास थी। वह मैंगो आइसक्रीम सिर्फ एक फ्लेवर नहीं, हमारे बचपन के अनछुए और बेबाक दिनों का सबसे खूबसूरत दस्तावेज़ थी।

रजनी कुमारी
लखनऊ उत्तर

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