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पैसे से बैर

पैसे से बैर है तो पैसा ठुकराता है
मुफलिसी का जहां है ना कटता है ना जाता है

पैसे से यारी कभी मन को भायी नही
दिल की सुनी दिमाग साथ छोड़ जाता है

वक़त दर वक़त ही लोगों पर जिया
ना था कोई इस दो जख मे खुदी के वास्ते मर जाता है

संबंधों पर ही जिया सम्बंध भी खो गये
समय है यार संबंधों का भी जनाजा निकल जाता है

अन्धेरे मे उजाले की आस का क्या मेल होता है
कभी कभी दुखों की काली स्याह रात के बाद सूरज भी निकलना भूल जाता है


संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र

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