
वीरों के आभूषण स्वर्ण मुकुट नहीं होते,
उनके माथे पर साहस के सूरज उगते होते।
नहीं चाहिए उनको हीरे-मोती की चमक,
कर्तव्य की राहों में ही मिलती उन्हें दमक।
सीने पर सजे घाव उनके गौरव के हार हैं,
हर चोट की कहानी में बलिदान के स्वर हैं।
त्याग की चूड़ियाँ पहने, धैर्य का कंगन धारे,
मातृभूमि की रक्षा को वे जीवन तक निहारे।
रणभूमि की धूल उन्हें चंदन-सी लगती है,
देशभक्ति की ज्योति उनके अंतर में जगती है।
जब संकट के बादल घिरते नभ के आँगन में,
वे बनकर दीपक जलते राष्ट्र के जीवन में।
उनकी आँखों में सपने केवल देश के होते,
अपने सुख-दुख भूल सदा जनहित में रोते।
वीरों का श्रृंगार न धन है, न वैभव की पहचान,
उनका सबसे सुंदर आभूषण है पावन बलिदान।
इसीलिए तो युग-युग तक उनका यश गाया जाता है,
वीरों के चरणों में पूरा भारत शीश झुकाता है।
डॉ रुपाली गर्ग









