
ममता की मधुरिम छाया है,
माँ जीवन का आधार है,
उसके आँचल की शीतलता,
जग में सबसे प्यार है।
खुद दुख सहकर हँसती रहती,
सुख संतानों पर वारती,
अपने सपनों को तज करके,
हर पीड़ा को वह हारती।
रात-रात भर जाग-जागकर,
लोरी मधुर सुनाती है,
नन्हे कदमों को थाम सदा,
चलना हमें सिखाती है।
उसकी ममता सागर जैसी,
गहरी और अपार रहे,
हर संकट की धूप सामने,
बनकर शीतल धार बहे।
त्याग, तपस्या और समर्पण,
माँ की अनुपम परिभाषा,
उसके चरणों में बसती है,
जीवन की सच्ची अभिलाषा।
माँ की वाणी मंगलमय है,
देती शुभ आशीष सदा,
उसकी सीखें राह दिखाएँ,
हों जब जीवन में बाधा।
ईश्वर का साकार रूप है,
माँ की पावन मूरत न्यारी,
जिस घर में माँ का वास रहे,
खुशियाँ रहतीं वहाँ हमारी।
नमन करूँ उस ममतामयी को,
जिसका ऋण न उतारा जाए,
माँ के चरणों की धूलि से ही,
जीवन सफल हमारा हो जाए।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार









