
धुएँ में लिखें नाम
कभी मुक्कमल नहीं होते,
वे बस कुछ पल ठहरते हैं —
फिर हवा की उंगलियां
उन्हें अपने साथ बहा लें जाती हैं.
मैंने भी एक नाम लिखा था,
कांपती उँगलियों से,
सांसों की गर्म राख पर —
इतनी सावधानी से
मानों कोई प्रार्थना लिख रही हूँ.
वह नाम सिर्फ नाम नहीं था,
मेरे भीतर का अधूरा आकाश था,
एक ऐसा चाँद
जिसे छूने की चाह मै
रातें उम्रभर जागती रहीं.
धुआँ ऊपर उठता रहा,
और उसके साथ
मेरी अनकही बातें भी —
वे बातें
जो कभी होठों तक आई नहीं
पर हर धड़कन मै
शोर करती रही.
कितना अजीब है न —
कुछ लोग जीवन मै
आग बनकर आते हैं,
रौशनी भी देते हैं.
और अंत मै
राख़ भी छोड़ जाते हैं.
तुम भी शायद ऐसे हीं थे —
एक जलता हुआ एहसास
जिसने मेरी रूह को छुआ भी
और जला भी दिया.
अब ज़ब शाम उतरती है
और चूल्हों, दीपों, अगरबत्तीयों से
उठता धुआँ उठता है,
मैं उसमें फिर वही नाम ढूंढती हूँ —
अधूरा…….. धुंधला…….. काँपता हुआ.
पर हर बार
हवा मुझसे कहती है —
“जो धुएँ मै लिखा जाए,
उसे थामा नहीं जाता….”
फिर भी
दिल कहाँ मानता है?
वह हर बिखरते धुएँ मै
तुम्हारा नाम चुन लेत्ता है,
और हर मिटते अक्षर के साथ
थोड़ा और टूट जाता है.
शायद प्रेम का सच यही है —
कुछ नाम किताबों मै नहीं
किस्मत मै नहीं
बस धुएँ मै लिखें जाते हैं.
ताकि मिटकर भी
हमारी रूह पर
हमेशा के लिए
लिखें रह जाएँ……
डॉ पल्लवी सिंह 'अनुमेहा '
लेखिका एवं कवयित्री
बैतूल, मध्यप्रदेश









