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याद बीते दिनों की

तेरे इन्तीज़ार की इन्तिहाँ हो गयी
वो दरख्त सूख गया खड़े तेरे आस मे एक ज़िंदगी बीत गयी

याद तेरे उन दिनों की जब आती है
कसम खुदा की जान जाती है

वो तेरा हंसना दरख्तों का मानो यूँ झूमना
याद आती है कि बरखा बहार आती है

आज भी उस दरख्त को निहारता हूँ
बीते पलों को याद कर आज का पल सँवारता हूँ

बहुत दर्द है तेरे जाने का
तन्हा तेरे कर जाने का

स्वरचित एवं मौलिक
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र

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